राष्ट्रवाणी: बिलासपुर प्रतिनिधि: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने गरियाबंद से महासमुंद तक बनने वाली लगभग 2,550 करोड़ रुपये लागत की ‘सीकासार-कोडार जलाशय लिंक कनाल (पाइपलाइन) परियोजना’ के टेंडर विवाद में अहम फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की युगलपीठ ने भोपाल की ‘ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड’ की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी परियोजना के लिए तकनीकी व व्यावसायिक पात्रता की शर्तें तय करना संबंधित विभाग का एकाधिकार है। जब तक किसी निर्णय में मनमानी, दुर्भावना या कानूनी अनियमितता साबित न हो, अदालत टेंडर की शर्तों में हस्तक्षेप नहीं करेगी। लगभग 2550 करोड़ की परियोजना और टर्नओवर विवाद: जल संसाधन विभाग रायपुर ने सीकासार से कोडार जलाशय तक पाइपलाइन निर्माण का ई-टेंडर निकाला था। इसमें टेंडर की अनुमानित लागत के दोगुने औसत वार्षिक टर्नओवर की शर्त रखी गई थी, जिसे ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिकाकर्ता की दलील: कंपनी का तर्क था कि टर्नओवर की इतनी बड़ी शर्त से प्रतिस्पर्धा सीमित होती है। कंपनी को निर्धारित शपथपत्र न देने और टर्नओवर पूरा न करने पर तकनीकी रूप से अयोग्य (Disqualified) कर दिया गया था। दिलीप बिल्डकॉन L-1 घोषित: 27 जुलाई 2026 को खोली गई वित्तीय निविदा में दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड सबसे कम बोली लगाने वाली L-1 कंपनी के रूप में उभरी। राज्य सरकार व बीएसपी का पक्ष: राज्य शासन और दिलीप बिल्डकॉन के वकीलों ने कहा कि याचिकाकर्ता ने टेंडर की सभी शर्तों को स्वीकार कर भाग लिया था, अयोग्य होने के बाद शर्तों को चुनौती देना नियमों के विरुद्ध है। अदालत की सख्त टिप्पणी: चीफ जस्टिस बेंच ने कहा कि टेंडर जारी करने वाली एजेंसी ही पात्रता तय करने की सबसे सही स्थिति में होती है। अदालत प्रशासनिक निर्णयों की समीक्षा अपीलीय संस्था की तरह नहीं कर सकती और न ही टेंडर की शर्तों को दोबारा लिख सकती है।
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