राष्ट्रवाणी: रायपुर। देश के लिए 67 अंतरराष्ट्रीय पदक जीतने वाले छत्तीसगढ़ के पैरा-आर्म रेसलर श्रीमंत झा ने राज्य सरकार से भावुक अपील की है। विश्व रैंकिंग में तीसरे और एशिया में नंबर-1 स्थान पर काबिज श्रीमंत का कहना है कि अगर इस बार भी उन्हें ‘शहीद राजीव पांडे पुरस्कार’ और सरकारी नौकरी नहीं मिली, तो वह अपने सभी 67 अंतरराष्ट्रीय पदक सरकार को सौंपकर उनकी नीलामी कर देंगे। उनका कहना है कि मेडल बेचकर मिलने वाले पैसों से वह परिवार का कर्ज चुकाएंगे और छोटा कारोबार शुरू करेंगे। श्रीमंत झा जन्म से दिव्यांग हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद उनके माता-पिता ने बेटे के सपनों को कभी टूटने नहीं दिया। पढ़ाई के लिए मां ने अपना मंगलसूत्र गिरवी रख दिया, जबकि पिता ने मजदूरी कर उनकी पढ़ाई, डाइट, जिम और प्रतियोगिताओं में भाग लेने का खर्च उठाया। परिवार इस उम्मीद में लगातार कर्ज के बोझ तले दबता गया कि एक दिन बेटा देश के लिए मेडल जीतेगा और सरकारी नौकरी मिलने से घर की आर्थिक स्थिति सुधरेगी। पिछले करीब 15 वर्षों से श्रीमंत झा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उन्होंने विभिन्न प्रतियोगिताओं में देश के लिए 67 अंतरराष्ट्रीय पदक जीते हैं। वर्तमान में वह पैरा-आर्म रेसलिंग में विश्व नंबर-3 और एशिया नंबर-1 खिलाड़ी हैं। इसके बावजूद उनका कहना है कि अब तक उन्हें न राज्य का सर्वोच्च खेल सम्मान मिला और न ही सरकारी नौकरी। श्रीमंत का कहना है कि वह कई वर्षों से लगातार ‘शहीद राजीव पांडे पुरस्कार’ के लिए आवेदन कर रहे हैं। हर बार अपनी उपलब्धियों और मेरिट के आधार पर आवेदन करने के बावजूद उन्हें अब तक यह सम्मान नहीं मिला। उनका कहना है कि 67 अंतरराष्ट्रीय पदक जीतने के बाद भी उन्हें वह पहचान नहीं मिली, जिसके वह हकदार हैं। श्रीमंत ने बताया कि वर्ष 2032 के पैरालंपिक खेलों में पैरा-आर्म रेसलिंग को शामिल किए जाने की तैयारी चल रही है। उनका सपना भारत के लिए पैरालंपिक में स्वर्ण पदक जीतने का है। इसी लक्ष्य के साथ वह लगातार तैयारी कर रहे थे, लेकिन आर्थिक तंगी और परिवार पर बढ़ते कर्ज ने उनकी राह मुश्किल कर दी है। उन्होंने कहा, “मैं 2032 पैरालंपिक की तैयारी में पूरी मेहनत से जुटा था, लेकिन अब परिस्थितियां साथ नहीं दे रही हैं। सिर्फ खेल से घर नहीं चलता। मेरे माता-पिता ने मेरे लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया। अब उनकी जिम्मेदारी मेरी है।” श्रीमंत झा ने राज्य सरकार से अपील करते हुए कहा कि उनकी उपलब्धियों और मेरिट के आधार पर उन्हें ‘शहीद राजीव पांडे पुरस्कार’ और सरकारी नौकरी दी जाए। उनका कहना है कि यह केवल उनका सम्मान नहीं होगा, बल्कि उनके माता-पिता के वर्षों के त्याग और संघर्ष का भी सम्मान होगा। श्रीमंत ने कहा कि यदि इस बार भी उन्हें पुरस्कार और सरकारी नौकरी नहीं मिली, तो वह अपने सभी 67 अंतरराष्ट्रीय पदक सरकार को सौंपकर उनकी नीलामी कर देंगे। नीलामी से मिलने वाली राशि से वह परिवार का कर्ज चुकाएंगे, छोटा व्यापार शुरू करेंगे और खेल से हमेशा के लिए दूरी बना लेंगे। अब देखना होगा कि राज्य सरकार श्रीमंत झा की मांग पर क्या फैसला लेती है। यह मामला सिर्फ एक पुरस्कार या नौकरी का नहीं, बल्कि उस खिलाड़ी के भविष्य का है, जिसने वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत और छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया।

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