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Home»International»ट्रंप का गुस्से वाला बयान: मनोवैज्ञानिकों का विश्लेषण
International

ट्रंप का गुस्से वाला बयान: मनोवैज्ञानिकों का विश्लेषण

Team RashtrawaniBy Team RashtrawaniJune 26, 2025No Comments3 Mins Read
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ट्रंप का गुस्से वाला बयान: मनोवैज्ञानिकों का विश्लेषण
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ब्रिटेन: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गत 24 जून को संवाददाताओं से कहा था कि मैं इजराइल से खुश नहीं हूं। उनका यह स्पष्ट बयान ईरान और इजराइल के बीच शांति समझौते के उनके प्रयासों के तहत आया।

इजराइल और ईरान के बीच युद्धविराम की घोषणा करने के एक दिन बाद ट्रंप ने कहा, ‘‘मैं इजराइल से खुश नहीं हूं। हमारे पास मूल रूप से दो देश हैं जो इतने लंबे समय से और इतनी भीषण लड़ाई लड़ रहे हैं कि उन्हें नहीं पता कि वे क्या कर रहे हैं।’’

ट्रंप की घोषणा के अगले दिन तक ईरान और इजराइल दोनों ने युद्ध विराम का उल्लंघन किया था। ट्रंप इस बात से साफ तौर पर नाराज थे और उनकी भाषा से यह पता चल रहा था। यह बोलने में हुई कोई चूक नहीं थी, इस पर तत्काल कोई खंडन नहीं किया गया, कोई खेद नहीं जताया गया, ना ही असहज महसूस करने का कोई संकेत दिया गया। वह बस गुस्से में थे, साफ तौर पर गुस्से में।

यह उस तरह की भाषा नहीं है जो आम तौर पर कोई राष्ट्रपति बोले। कुछ खबरों के मुताबिक अंग्रेजी के ‘एफ..’ अक्षर वाला अपशब्द पहले भी इस स्तर पर बैठे लोगों द्वारा इस्तेमाल किया जाता रहा है, लेकिन आमतौर पर ऐसा बंद दरवाजों में होता है।

हम राष्ट्रपतियों से शांत, संयमित, विचारशील होने की उम्मीद करते हैं। ट्रंप की टिप्पणी में इनमें से कुछ भी नहीं था। अमेरिका के 26वें राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट ने एक बार ऐसी विदेश नीति की सिफारिश की थी जो ‘‘विनम्रता से अपनी बात रखने के साथ ही लंबी छड़ी लेकर चलने’’ की बात करती थी। इसका मतलब था कि अमेरिका कूटनीति और बातचीत पर जोर देगा, लेकिन साथ ही अपनी सैन्य शक्ति का भी प्रदर्शन करेगा ताकि जरूरत पड़ने पर उसका उपयोग किया जा सके।

रूजवेल्ट शांति से धमकी देने का सुझाव दे रहे थे, लेकिन ट्रंप ने हताशा दिखाई और मुश्किल से नियंत्रित कर पाए। उनकी उग्र, आक्रामक प्रतिक्रिया किसी पुरानी मनोविज्ञान की पाठ्यपुस्तक से सीधे निकली हुई लग रही थी।
1930 के दशक में, मनोवैज्ञानिकों ने आक्रामक व्यवहार कैसे उत्पन्न हो सकता है, यह समझाने के लिए निराशा-आक्रामकता की परिकल्पना विकसित की। इस अवधारणा में सुझाव दिया गया कि जब किसी व्यक्ति का लक्ष्य किसी तरह से अवरुद्ध होता है, तो यह निराशा की ओर ले जाता है, जिसके परिणामस्वरूप आक्रामकता आती है।

आक्रामकता को निराशा की इस अप्रिय स्थिति को दूर करने का एक ‘स्वाभाविक’ तरीका माना जाता था। वह स्पष्ट रूप से अलग समय था। अगले कुछ दशकों में, इस परिकल्पना को अधिकांश मनोवैज्ञानिकों ने जटिल मानव व्यवहार का एक बड़ा सरलीकरण माना। इसने निराशा और आक्रामकता के बीच एक सीधा संबंध मान लिया, अन्य सभी स्थितिजन्य और संज्ञानात्मक कारकों को अनदेखा कर दिया गया।

मनोवैज्ञानिकों ने तर्क दिया कि मनुष्य इससे कहीं अधिक जटिल हैं – वे अपनी निराशाओं से निपटने के अन्य तरीके खोजते हैं। वे समाधान खोजने के लिए अपनी तर्कसंगत विचार प्रणाली का उपयोग करते हैं। जब वे इस आदिम तरीके से निराश होते हैं तो उन्हें भड़कने की जरूरत नहीं होती। शायद यही कारण है कि जब कई लोग अमेरिकी राष्ट्रपति को इस तरह की कुछ स्थितियों में देखते हैं तो वे चौंक जाते हैं। हममें से कई लोगों को यह सब इतना अपरिष्कृत, इतना भयावह लगता है।

तेज बनाम धीमी सोच:

नोबेल पुरस्कार विजेता और मनोवैज्ञानिक डेनियल काह्नमैन ने अपनी पुस्तक ‘ंिथंिकग, फास्ट एंड स्लो’ (2011) में उन दो प्रणालियों की विशेषता बताई है जो रोजमर्रा के निर्णय लेने को आधार बनाती हैं। उनका काम यह समझने में मदद कर सकता है कि यहां क्या हो रहा है।

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