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Home»Country»भोपाल गैस त्रासदी : 40 साल बाद मिटा कचरे का ‘कलंक’, कुल 358 टन अपशिष्ट जलकर भस्म
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भोपाल गैस त्रासदी : 40 साल बाद मिटा कचरे का ‘कलंक’, कुल 358 टन अपशिष्ट जलकर भस्म

Team RashtrawaniBy Team RashtrawaniJuly 3, 2025No Comments4 Mins Read
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भोपाल गैस त्रासदी : 40 साल बाद मिटा कचरे का ‘कलंक’, कुल 358 टन अपशिष्ट जलकर भस्म
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इंदौर. भोपाल गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदार यूनियन कार्बाइड कारखाने के कचरे का नामो-निशान मिटाने की दिशा में बृहस्पतिवार को अहम मुकाम हासिल किया गया, जब इस बंद पड़े कारखाने की 19 टन मिट्टी के साथ ही इसकी 2.22 टन वजनी पैकेजिंग सामग्री भी धार जिले के एक अपशिष्ट निपटान संयंत्र में जलकर राख में बदल गई. राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक अधिकारी ने यह जानकारी दी.

अधिकारी ने बताया कि मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश पर यूनियन कार्बाइड कारखाने के 337 टन कचरे की मूल खेप को पीथमपुर के संयंत्र में अलग-अलग चरणों में पहले ही भस्म किया जा चुका है. भोपाल में दो और तीन दिसंबर 1984 की दरमियानी रात यूनियन कार्बाइड कारखाने से अत्यधिक जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस का रिसाव हुआ था. इससे कम से कम 5,479 लोग मारे गए थे और हजारों लोग अपंग हो गए थे. इसे दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक आपदाओं में गिना जाता है.

देश-विदेश के संयंत्रों में यूनियन कार्बाइड कारखाने के कचरे को नष्ट किए जाने के लिए गुजरे चार दशक के दौरान कई योजनाएं बनीं और विरोध प्रदर्शनों के बीच रद्द हुईं. आखिरकार, इस कचरे को इंदौर से करीब 30 किलोमीटर दूर पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र में एक निजी कंपनी द्वारा संचालित अपशिष्ट निपटान संयंत्र में भस्म करके 800 टन से ज्यादा वजनी राख में बदल दिया गया.

राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी श्रीनिवास द्विवेदी ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया,”हमने यूनियन कार्बाइड कारखाने के परिसर की मिट्टी में शामिल लगभग 19 टन अतिरिक्त अपशिष्ट और कचरे की पैकेजिंग सामग्री के 2.22 टन अपशिष्ट को भी पीथमपुर के संयंत्र में जलाकर भस्म कर दिया है. इसके साथ ही, भोपाल के इस कारखाने के कुल 358 टन अपशिष्ट को जलाकर राख में बदल दिया गया है.” उन्होंने कहा कि पिछले 40 साल से निपटारे की बाट जोह रहा यह कचरा ‘कलंक’ की तरह था और आम जन मानस में फैली तमाम भ्रांतियों को दूर करते हुए इसे सफलतापूर्वक भस्म किया जाना राज्य के लिए गर्व का विषय है.

द्विवेदी ने बताया कि यूनियन कार्बाइड कारखाने के 337 टन कचरे की मूल खेप को अलग-अलग चरणों में भस्म किए जाने की प्रक्रिया पहले ही संपन्न हो चुकी है. राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी ने कहा,”पीथमपुर के संयंत्र में यूनियन कार्बाइड कारखाने का कचरा जलाए जाने के दौरान तमाम उत्सर्जन मानक सीमा के भीतर पाए गए. इस प्रक्रिया के दौरान पीथमपुर के संयंत्र के कर्मचारियों और आस-पास के इलाकों में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर किसी विपरीत असर के बारे में हमारे पास कोई सूचना नहीं है.” बहरहाल, यूनियन कार्बाइड कारखाने के कचरे को नष्ट किए जाने की वैज्ञानिक प्रक्रिया का एक चरण अभी बाकी है.

द्विवेदी ने बताया,”यूनियन कार्बाइड कारखाने के कचरे को चूना और अन्य चीजें मिलाकर भस्मक में जलाया गया था, उससे 800 टन से ज्यादा राख और अन्य अवशेष निकले हैं.” उन्होंने बताया कि इस राख और अन्य अवशेषों को बोरों में सुरक्षित तरीके से भरकर पीथमपुर के संयंत्र के ‘लीक-प्रूफ स्टोरेज शेड’ में रखा गया है और इसे दफनाने के लिए तय वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत विशेष सुविधा (लैंडफिल सेल) का निर्माण कराया जा रहा है.

द्विवेदी ने बताया,”केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दिशा-निर्देशों के मुताबिक लैंडफिल सेल जमीन से करीब 1.50 मीटर ऊपर बनाया जा रहा है. इसमें अलग-अलग परतें होंगी ताकि राख और अन्य अवशेष अंदर जाकर मिट्टी और भूजल को प्रदूषित न कर सकें.” भोपाल में बंद पड़े यूनियन कार्बाइड कारखाने के कचरे को सूबे की राजधानी से करीब 250 किलोमीटर दूर पीथमपुर के संयंत्र में दो जनवरी को पहुंचाया गया था. इसके बाद पीथमपुर में कई विरोध प्रदर्शन हुए थे. प्रदर्शनकारियों ने इस कचरे के निपटान से इंसानी आबादी और आबो-हवा को नुकसान की आशंका जताई थी जिसे प्रदेश सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया था.

राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का दावा है कि यूनियन कार्बाइड कारखाने के कचरे को जलाए जाने के दौरान पीथमपुर के संयंत्र से पार्टिकुलेट मैटर, सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड, हाइड्रोजन फ्लोराइड और नाइट्रोजन के ऑक्साइड के साथ ही मर्करी, कैडमियम और अन्य भारी धातुओं के उत्सर्जन मानक सीमा के भीतर पाए गए.

बोर्ड के मुताबिक, यूनियन कार्बाइड कारखाने के कचरे में इस बंद पड़ी इकाई के परिसर की मिट्टी, रिएक्टर अवशेष, सेविन (कीटनाशक) अवशेष, नेफ्थाल अवशेष और “अर्द्ध प्रसंस्कृत” अवशेष शामिल थे. बोर्ड का कहना है कि वैज्ञानिक प्रमाणों के अनुसार, इस कचरे में सेविन और नेफ्थाल रसायनों का प्रभाव पहले ही ”लगभग नगण्य” हो चुका था. बोर्ड के मुताबिक इस कचरे में मिथाइल आइसोसाइनेट गैस का कोई अस्तित्व नहीं था और इसमें किसी तरह के रेडियोधर्मी कण भी नहीं थे.

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