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Home»Entertainment»अदालत इस बात की पड़ताल करेगी कि क्या केंद्र को ‘उदयपुर फाइल्स’ फिल्म में कट लगाने का अधिकार है?
Entertainment

अदालत इस बात की पड़ताल करेगी कि क्या केंद्र को ‘उदयपुर फाइल्स’ फिल्म में कट लगाने का अधिकार है?

Team RashtrawaniBy Team RashtrawaniJuly 30, 2025No Comments4 Mins Read
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अदालत इस बात की पड़ताल करेगी कि क्या केंद्र को ‘उदयपुर फाइल्स’ फिल्म में कट लगाने का अधिकार है?
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नयी दिल्ली. दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को केंद्र से जानना चाहा कि क्या उसे अपनी पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग करते हुए फिल्म ‘उदयपुर फाइल्स – कन्हैया लाल टेलर मर्डर’ में छह कट लगाने का आदेश पारित करने का अधिकार है. मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने कहा, ”आपको कानून के दायरे में रहकर ही शक्तियों का प्रयोग करना होगा. आप इससे आगे नहीं जा सकते.” अदालत ने यह सवाल तब पूछा जब उसे बताया गया कि केंद्र ने सिनेमैटोग्राफ अधिनियम के तहत अपनी पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग करते हुए फिल्म के निर्माताओं को एक अस्वीकरण के अलावा छह कट लगाने का सुझाव दिया है.

पीठ को यह भी बताया गया कि हालांकि फिल्म को पुन: प्रमाणित कर दिया गया है, लेकिन यह निर्माताओं को जारी नहीं किया गया है, क्योंकि मामला उच्च न्यायालय में लंबित है. याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत के समक्ष दलील दी कि केंद्र सरकार ने अपनी पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग इस तरह से किया है जो सिनेमैटोग्राफ अधिनियम की वैधानिक योजना का उल्लंघन करता है.

पीठ ने केंद्र और केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा से पूछा ”आपने जो आदेश पारित किया है, जिसमें आपने कहा कि छह कट लगाए जाएं वगैरह – क्या ऐसा करने का अधिकार आपको कानून के तहत मिला है?” इसने पूछा, ”पिछले दौर में, इस अदालत ने सिनेमैटोग्राफ अधिनियम की धारा 6 के प्रावधान में बदलाव देखा है. पहले और अब में क्या फर्क है.”

अदालत दर्जी कन्हैया लाल साहू हत्याकांड के एक आरोपी मोहम्मद जावेद की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें इस आधार पर फिल्म की रिलीज पर आपत्ति जताई गई थी कि इससे मुकदमे के दौरान उसके मामले पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. पीठ ने कहा, ” (10 जुलाई का) आदेश धारा 6 के तहत पुनरीक्षण याचिका पर निर्णय लेने के लिए था. निर्माता या बोर्ड को (कट लगाने के लिए कहने) कोई आदेश नहीं था.”

इसने कहा, ” पिछले आदेश को देखिए, अदालत ने कानून में बदलावों पर गौर किया है. पहले और मौजूदा प्रावधानों और बदलावों पर गौर किया गया. यह स्पष्ट रूप से देखा गया कि धारा 6 के तहत किस तरह के आदेश पारित किए जा सकते हैं… यह एक वैधानिक उपाय था, यह एक क.ानूनी उपाय था, जिसकी ओर याचिकाकर्ताओं को भेज दिया गया था. आपको क.ानून के दायरे में रहकर ही अपनी शक्तियों का प्रयोग करना होगा. आप इससे आगे नहीं जा सकते.” अधिनियम की धारा 6 केंद्र सरकार को फिल्म प्रमाणन पर पुनरीक्षण शक्तियां प्रदान करती है.

शर्मा ने कहा कि फिल्म दो चरणों में जांची गई है, पहला सेंसर बोर्ड द्वारा, जिसने 55 कट सुझाए, और दूसरा समिति द्वारा, जिसने छह कट और लगाने को कहा. इस प्रकार कुल 61 कट हो गए. जावेद का प्रतिनिधित्व कर रहीं वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने दलील दी कि केंद्र द्वारा तीन प्रकार की पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग किया जा सकता है – सरकार कह सकती है कि फिल्म का प्रसारण नहीं किया जा सकता; वे प्रमाणन को बदल सकते हैं या इसे निलंबित कर सकते हैं.

उन्होंने कहा, ”यह वही नहीं कर सकता जो इसने यहां किया है, यानी कट सुझाना, संवाद हटाना, अस्वीकरण जोड़ना, सेंसर बोर्ड की तरह अस्वीकरणों को संशोधित करना. यह नहीं कर सकता.” गुरुस्वामी ने अपनी दलीलें पूरी कर लीं, जबकि शर्मा की दलीलें अधूरी रहीं और अदालत एक अगस्त को कार्यवाही जारी रखेगी. जावेद की याचिका के अलावा जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने भी एक याचिका दायर की है. वकील की अनुपलब्धता के कारण इस पर सुनवाई नहीं हो सकी. उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद फिल्म से संबंधित दो याचिकाएं उच्च न्यायालय के समक्ष आईं. शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे फिल्म की रिलीज की अनुमति देने के केंद्र के पुनरीक्षण आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय में जाएं.

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