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Home»Country»न्यायालय ने बलात्कार को ‘वास्तविक प्रेम’ के मामलों से अलग करने की वकालत की
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न्यायालय ने बलात्कार को ‘वास्तविक प्रेम’ के मामलों से अलग करने की वकालत की

Team RashtrawaniBy Team RashtrawaniAugust 19, 2025No Comments3 Mins Read
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न्यायालय ने बलात्कार को ‘वास्तविक प्रेम’ के मामलों से अलग करने की वकालत की
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नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को बलात्कार और वयस्कता की ओर बढ. रहे युवाओं से जुड़े वास्तविक प्रेम संबंधों के मामलों के बीच अंतर करने की आवश्यकता पर बल दिया. न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने सह-शिक्षा संस्थानों तथा विश्वविद्यालयों के अस्तित्व का उल्लेख करते हुए कहा, ”अब, उनमें एक-दूसरे के लिए भावनाएं विकसित होती हैं. क्या आप कह सकते हैं कि प्रेम करना अपराध है? हमें इसमें और बलात्कार आदि जैसे आपराधिक कृत्य में अंतर रखना होगा.” यह टिप्पणी एक याचिका पर आई, जिसमें यह प्रश्न उठाया गया था कि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत सहमति की आयु, जो 18 वर्ष है, को घटाकर 16 वर्ष किया जाना चाहिए या नहीं.

पीठ ने कहा, ”जब वास्तविक प्रेम संबंध होते हैं, तो वे एक-दूसरे को पसंद करते हैं और वे शादी करना चाहते हैं… ऐसे मामलों को आपराधिक मामलों के समान न समझें.” इसने कहा, ”आपको समाज की वास्तविकता को ध्यान में रखना होगा.” शीर्ष अदालत ने ऐसे जोड़ों के सामने आने वाले आघात का उल्लेख किया, जो आमतौर पर पॉक्सो अधिनियम के तहत लड़की के माता-पिता द्वारा मामला दर्ज कराए जाने के बाद पुरुष साथी को जेल भेजे जाने के कारण होता है.

पीठ ने कहा, ”यह समाज की कठोर वास्तविकता है.” इसने कहा कि घर से भागने की घटनाओं को छिपाने के लिए भी पॉक्सो अधिनियम के तहत मामले दर्ज कराए जाते हैं. याचिकाकर्ता संगठन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फुल्का ने सुरक्षा उपायों की मांग की. पीठ ने कहा कि पुलिस को मामले की जांच कर यह पता लगाना होगा कि यह अपहरण, मानव तस्करी का मामला है या फिर यह सच्चे प्रेम का मामला है.

फुल्का ने कहा कि सहमति की उम्र से संबंधित इसी तरह के मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय की एक अन्य पीठ विचार कर रही है. उन्होंने कहा कि वह याचिका में किए गए निवेदन के संदर्भ में शीर्ष अदालत के कुछ आदेशों को रिकॉर्ड पर रखेंगे, जिसके बाद पीठ ने मामले की सुनवाई 26 अगस्त तक के लिए स्थगित कर दी.

हाल में, केंद्र ने उच्चतम न्यायालय में सहमति की वैधानिक आयु 18 वर्ष निर्धारित करने का बचाव करते हुए कहा कि यह निर्णय एक ”सुविचारित और सुसंगत” नीतिगत विकल्प है जिसका उद्देश्य नाबालिगों को यौन शोषण से बचाना है. केंद्र ने कहा कि सहमति की उम्र को कम करना या किशोर आयु के प्रेम की आड़ में अपवाद पेश करना न केवल कानूनी रूप से अनुचित होगा, बल्कि खतरनाक भी होगा.
लिखित अभिवेदन एक अलग मामले में दायर किया गया जो किशोरावस्था के संबंधों में उम्र के मुद्दे को उठाता है.

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