बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में MBBS एडमिशन को लेकर बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर हुआ है। तीन छात्राओं ने फर्जी EWS प्रमाणपत्र जमा कर मेडिकल कॉलेजों में सीटें हासिल कीं। इस खुलासे के बाद मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
जानकारी के मुताबिक, सुहानी सिंह, श्रेयांशी गुप्ता और भाव्या मिश्रा नामक छात्राओं ने बिलासपुर तहसील कार्यालय से जारी EWS प्रमाणपत्र दिखाकर MBBS में दाखिला लिया। लेकिन जब दस्तावेजों की जांच की गई तो पता चला कि तहसील कार्यालय के रिकॉर्ड में इनके नाम से न तो कोई आवेदन दर्ज है और न ही कोई वैध प्रमाणपत्र जारी हुआ था।

कलेक्टर बिलासपुर संजय अग्रवाल ने पुष्टि करते हुए कहा कि अब तक कुल 7 संदिग्ध मामले सामने आए हैं, इनमें से 3 में फर्जीवाड़ा साबित हो चुका है और बाकी मामलों की जांच जारी है। वहीं तहसीलदार गरिमा सिंह ठाकुर ने कहा कि ये सभी प्रस्तुत प्रमाणपत्र पूरी तरह फर्जी हैं और विभागीय स्तर पर कार्रवाई की जा रही है।
पूजा खेडेकर केस से मिलती-जुलती कहानी
यह मामला चर्चित पूजा खेडेकर प्रकरण की याद दिलाता है। ट्रेनी IAS पूजा खेडेकर ने OBC और दिव्यांगता के फर्जी सर्टिफिकेट्स लगाकर UPSC परीक्षा पास कर ली थी। बाद में जांच में सच्चाई उजागर हुई और उनका चयन रद्द कर दिया गया। बिलासपुर में सामने आया मामला भी लगभग उसी पैटर्न पर है। यहां भी फर्जी प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल कर असली हकदारों का हक छीन लिया गया।
दोषियों के खिलाफ होगी कड़ी कार्रवाई
सिम्स मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. रमणेश मूर्ति ने बताया कि पहले भी मनेंद्रगढ़ कलेक्टर की रिपोर्ट पर एक फर्जी EWS सर्टिफिकेट के मामले में एडमिशन रद्द किया गया था। अब नए मामलों में जांच के बाद दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उनका कहना है कि यह बेहद गंभीर अपराध है और इससे न केवल हकदार छात्रों का भविष्य प्रभावित होता है बल्कि मेडिकल शिक्षा की साख भी दांव पर लग जाती है।
बड़ा सवाल, फर्जीवाड़ा कैसे हुआ
फर्जीवाड़े के उजागर होने के बाद प्रशासन ने जाति और आरक्षण से जुड़े दस्तावेजों की बारीकी से जांच की बात कही है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसा फर्जीवाड़ा संभव कैसे हुआ? क्या यह सिर्फ छात्राओं की गलती है या फिर इसके पीछे सिस्टम के भीतर भी मिलीभगत है?जनता अब पारदर्शिता और जिम्मेदारों की पहचान की मांग कर रही है।

