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Home»Chhattisgarh»HIV पीड़ित की पहचान उजागर करने पर अदालत ने अस्पताल को दो लाख रुपये मुआवजा देने का दिया आदेश
Chhattisgarh

HIV पीड़ित की पहचान उजागर करने पर अदालत ने अस्पताल को दो लाख रुपये मुआवजा देने का दिया आदेश

Team RashtrawaniBy Team RashtrawaniOctober 16, 2025No Comments3 Mins Read
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HIV पीड़ित की पहचान उजागर करने पर अदालत ने अस्पताल को दो लाख रुपये मुआवजा देने का दिया आदेश
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बिलासपुर. छत्तीसग­ढ़ उच्च न्यायालय ने राज्य की राजधानी रायपुर स्थित डॉ. भीमराव आंबेडकर अस्पताल में एचआईवी पीड़ित महिला और उसके शिशु की पहचान उजागर किए जाने के मामले में राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर नवजात शिशु के माता-पिता को दो लाख रुपये का मुआवजा दे. उच्च न्यायालय ने अपने पूर्व आदेश के अनुसार 30 अक्टूबर को मामले में अग्रिम निगरानी और अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश भी दिया है.

उच्च न्यायालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभू दत्ता गुरु की पीठ ने बुधवार को मामले की सुनवाई के बाद अपने आदेश में कहा, ह्लचूंकि नवजात शिशु की पहचान उजागर हो चुकी है और अस्पताल अधिकारियों द्वारा गोपनीयता एवं प्रोटोकॉल का उल्लंघन करते हुए उचित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया, इसलिए हम छत्तीसग­ढ़ राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश देते हैं कि वे नवजात शिशु के माता-पिता को आज से चार सप्ताह के भीतर दो लाख रुपये की मुआवजा राशि देना सुनिश्चित करें.ह्व राज्य के एक स्थानीय समाचार पत्र में डॉ. भीमराव आंबेडकर मेमोरियल अस्पताल, रायपुर से संबंधित एक समाचार प्रकाशित हुआ था. इस खबर में कहा गया कि वहां एक नवजात शिशु के पास एक पोस्टर लगाया गया था जिसमें लिखा था कि बच्चे की मां एचआईवी संक्रमित है.

बच्चे की मां को जच्चा-बच्चा वार्ड में भर्ती किया गया था जबकि शिशु को ‘नर्सरी’ (जहां बच्चे को रखा जाता है) में रखा गया था. जब शिशु के पिता उसे देखने पहुंचे तो उन्होंने बच्चे के पास वह पोस्टर देखा और अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख सके तथा रोने लगे.
इस घटना को उच्च न्यायालय ने स्वत? संज्ञान में लेते हुए जनहित याचिका के रूप में सूचीबद्ध किया.

न्यायालय ने माना कि यह कृत्य न केवल अमानवीय है बल्कि अनैतिक भी है. न्यायालय के अनुसार, चिकित्सा संस्थान का यह व्यवहार अत्यंत आपत्तिजनक है क्योंकि इससे मां और बच्चे की पहचान सार्वजनिक हुई, जो न केवल उन्हें सामाजिक कलंक का शिकार बना सकती है बल्कि उनके भविष्य को भी प्रभावित कर सकती है.

अदालत ने कहा कि यह कृत्य संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त गोपनीयता और गरिमा के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है.
इसने कहा कि सार्वजनिक वार्ड में इस प्रकार के पोस्टर लगाना गंभीर चूक को दर्शाता है और यह चिकित्सा कर्मचारियों में एचआईवी/एड्स से पीड़ित व्यक्तियों के अधिकारों के प्रति जागरुकता की कमी को भी उजागर करता है.

उच्च न्यायालय ने इस मामले में 10 अक्टूबर को छत्तीसग­ढ़ सरकार के मुख्य सचिव को निर्देश दिया था कि वे अगली सुनवाई की तिथि से पहले मामले की जांच करें तथा मरीजों की चिकित्सा स्थितियों की गोपनीयता सुनिश्चित करने के संबंध में व्यक्तिगत हलफनामा प्रस्तुत करें. इसके पश्चात, मामले से संबंधित तथ्यों की जांच हेतु चिकित्सा शिक्षा निदेशक की अध्यक्षता में एक जांच समिति का गठन किया गया, जिसकी रिपोर्ट 14 अक्टूबर को प्रस्तुत की गई.

हलफनामे में कहा गया है कि सरकार इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने तथा ऐसा स्वास्थ्यकर्मी वर्ग तैयार करने के लिए सक्रिय कदम उठाएगी, जो कानूनी और नैतिक जिम्मेदारियों के प्रति संवेदनशील और जागरूक हो. राज्य सरकार की ओर से अस्पताल प्रबंधन का बचाव किया गया, किंतु न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि नवजात शिशु की पहचान उजागर हो चुकी है और अस्पताल अधिकारियों द्वारा गोपनीयता का उल्लंघन करते हुए उचित प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया.  न्यायालय ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि नवजात शिशु के माता-पिता को चार सप्ताह के भीतर दो लाख रुपये की मुआवजा राशि दी जाए.

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