राष्ट्रवाणी: प्रतिनिधि, रायपुर। प्रदेश के सुदूर वनांचल अबूझमाड़ की पारंपरिक कृषि और वन उपजों को अब वैश्विक पहचान मिलने जा रही है। नारायणपुर जिले के तीन स्थानीय उत्पादों पीला कोसरा (आर्क), काला कोसरा और तिखुर को जीआई टैग (भौगोलिक संकेतक) दिलाने की आधिकारिक प्रक्रिया शुरू हो गई है। यह पहला मौका है जब अबूझमाड़ जैसे दूरस्थ जनजातीय क्षेत्र की पारंपरिक फसलों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेटेंट कराने की दिशा में यह ऐतिहासिक कदम उठाया गया है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के विज्ञानियों ने अबूझमाड़ के जनजातीय समुदाय की दीर्घायु, सुदृढ़ स्वास्थ्य और खान-पान पर विशेष शोध किया। अध्ययन में सामने आया कि स्थानीय ग्रामीणों की रोग प्रतिरोधक क्षमता का मुख्य आधार उनके दैनिक आहार में शामिल ये पारंपरिक मिलेट्स हैं। प्रमुख विज्ञानी डा. दीपक शर्मा के अनुसार इन तीनों ही उत्पादों में लो-ग्लाइसेमिक इंडेक्स पाया जाता है, जो मधुमेह के मरीजों के लिए बेहद लाभदायक साबित हो सकता है। वर्तमान में इनके अन्य पोषण और औषधीय गुणों की गहन प्रयोगशाला जांच जारी है। नारायणपुर जिले के पारंपरिक कृषि एवं वन उत्पादों को भौगोलिक संकेतक टैग दिलाने के लिए कलेक्टर नम्रता जैन के मार्गदर्शन में पहल की जा रही है। पखवाड़ेभर पहले इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के विज्ञानियों के दल ने ओरछा विकासखंड के कच्चापाल व कुतुल ग्रामों का स्थलीय निरीक्षण कर स्थानीय उत्पादों का अध्ययन किया। विज्ञानियों ने पीढ़ियों से सहेजी जा रही लिटिल मिलेट की किस्मों काला कोसरा व पीली अर्क तथा प्राकृतिक रूप से उगने वाले तीखुर के जैविक, ऐतिहासिक व सांस्कृतिक पहलुओं का दस्तावेजीकरण किया है। विज्ञानियों ने इन उत्पादों की विशिष्ट गुणवत्ता, पारंपरिक खेती की पद्धतियों, स्थानीय बीजों की विशेषताओं, उत्पादन प्रणाली, भौगोलिक परिस्थितियों तथा ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व का सूक्ष्म परीक्षण किया। साथ ही स्थानीय किसानों एवं ग्रामीणों से संवाद कर इन उत्पादों से जुड़े पारंपरिक ज्ञान, अनुभव और संरक्षण की स्थानीय पद्धतियों का भी संकलन किया गया। जीआइ टैग मिलने से न केवल इन उत्पादों को बड़ा बाजार मिलेगा और मूल्य संवर्धन होगा, बल्कि अबूझमाड़ के किसानों और ग्रामीणों की आजीविका को मजबूती मिलेगी तथा उनकी पारंपरिक एवं जैविक विरासत का संरक्षण हो सकेगा। पीला कोसरा: यह अबूझमाड़ का पारंपरिक लघु धान्य है। इसका पीला दाना लो-ग्लाइसेमिक और औषधीय गुणों से भरपूर होता है, जो डायबिटीज में बेहद फायदेमंद है। काला कोसरा: गहरा छिलका वाला यह पौष्टिक मिलेट कुटकी की प्रजाति है। यह वनांचल के आदिवासियों का मुख्य आहार और रोग प्रतिरोधक क्षमता का आधार है। तीखुर: यह हल्दी परिवार का प्राकृतिक कंद है। इससे प्राप्त सफेद स्टार्च पाउडर का उपयोग व्रत में और गर्मियों में शरीर को ठंडक देने के लिए होता है। लैब टेस्ट के शुरुआती संकेत बेहद आशाजनक हैं। हमारी प्राथमिक चिंता इन पारंपरिक किस्मों की शुद्धता को बनाए रखते हुए इनका व्यावसायिक और विज्ञानी संरक्षण करना है। जीआई टैगिंग से न केवल इन फसलों का बौद्धिक अधिकार छत्तीसगढ़ के पास सुरक्षित होगा, बल्कि इससे राष्ट्रीय स्तर पर शोध के नए रास्ते भी खुलेंगे। हम एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार कर रहे हैं, जिससे वनांचल के जनजातीय परिवारों को उनकी सदियों पुरानी कृषि परंपरा का सीधा और स्थायी आर्थिक लाभ मिल सके।- डॉ. दीपक शर्मा, प्रमुख विज्ञानी, आईजीकेवी।
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