राष्ट्रवाणी: प्रतिनिधि, राजनांदगांवःपरंपरागत खेती के दायरे से बाहर निकलकर आधुनिक तकनीक और समेकित कृषि प्रणाली (इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम) को अपनाने वाले राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ विकासखंड अंतर्गत पारागांवखुर्द के 43 वर्षीय प्रगतिशील किसान एनेश्वर वर्मा ने अपनी मेहनत से गांव को एक नई पहचान दिला दी है। आज यह गांव फल और सब्जी उत्पादन के मामले में छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी अपनी एक अलग पहचान बना चुका है। एनेश्वर वर्मा ने करीब 70 एकड़ के क्षेत्र में समेकित कृषि अपनाकर हर वर्ष लाखों रुपये का मुनाफा अर्जित किया है। उनकी इस शानदार सफलता से प्रेरित होकर अब क्षेत्र के 500 से अधिक किसान भी पारंपरिक खेती छोड़कर आधुनिक खेती की राह पर चल पड़े हैं। उनकी इस उपलब्धि के लिए उन्हें हाल ही में दिल्ली में प्रतिष्ठित ‘राष्ट्रीय नवोन्मेषी किसान पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया है। कृषि और पशुपालन को बनाया एक-दूसरे का पूरक एनेश्वर की खेती-किसानी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि उन्होंने कृषि और पशुपालन को एक-दूसरे का मजबूत पूरक बना दिया है। उनके फार्म में पशुपालन, मछली पालन, केंचुआ पालन और जैविक खेती एक साथ बड़े पैमाने पर संचालित हो रही है। उनके फार्म में लगभग 60 देशी गायें हैं, जिनके गोबर का उपयोग कर वे वर्मी कंपोस्ट (केंचुआ खाद) तैयार करते हैं। इसके लिए उन्होंने अपने फार्म में करीब 50 वर्मी टैंक बनाए हैं। एनेश्वर का दृढ़ विश्वास है कि लगातार घटती कृषि भूमि और बढ़ती लागत के इस दौर में केवल समेकित कृषि ही किसानों की आर्थिक समृद्धि का सबसे प्रभावी और टिकाऊ मॉडल है। ज्ञान और अनुभव साझा करने के लिए उन्होंने “किसानी बातें” नाम से अपना एक यूट्यूब चैनल भी बनाया है, जिसके जरिए वे अन्य किसानों को आधुनिक और समेकित खेती की तकनीक सिखाते हैं। विरासत में मिला खेती का हुनर और आधुनिक तकनीक एनेश्वर के पास कुल 50 एकड़ अपनी निजी भूमि है, जबकि 20 एकड़ भूमि उन्होंने लीज पर लेकर खेती का विस्तार किया है। खेती के प्रति उनका यह गहरा लगाव उन्हें विरासत में मिला है। उनके दादा स्व. गुहाराम लोधी को भी वर्ष 1997 में उन्नत कृषि पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। वर्ष 2006 से विधिवत खेती की शुरुआत करने वाले एनेश्वर ने लगातार आधुनिक तकनीकों को अपनाकर अपनी आमदनी कई गुना बढ़ा ली है। वर्तमान में वे अपने खेतों में सीडलेस नींबू, आम, चीकू, अमरूद, काजू, नारियल, अंजीर, सीताफल और ड्रैगन फ्रूट जैसी आधुनिक एवं उन्नत फसलों की खेती कर रहे हैं। इसके साथ ही वे गोभी, परवल, खीरा और पारंपरिक धान की फसल भी बड़े पैमाने पर लेते हैं। खास बात यह है कि उन्होंने अपने खेत की मेड़ों पर इमारती लकड़ी के पौधे रोपकर भूमि के हर एक इंच हिस्से का बेहतरीन उपयोग किया है। उनकी बेहतरीन उपज और गुणवत्ता को देखकर ओड़िशा, झारखंड, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे दूर-दराज के राज्यों से व्यापारी सीधे उनके खेत तक पहुंचकर फल और सब्जियां खरीद रहे हैं।
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