राष्ट्रवाणी: प्रदीप बरमैया कोरबा : जिस चारपारा राखड़ बांध की पहचान कभी राख के भंडारण और उससे जुड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों के रूप में थी, अब उसी क्षेत्र में विकसित हरियाली की वैज्ञानिक पड़ताल होने जा रही है। गुरु घासीदास विश्वविद्यालय की टीम यहां पहुंचकर यह अध्ययन करेगी कि राख से पुनर्वासित भूमि पर वर्षों में विकसित किए गए हरित क्षेत्र ने किस तरह का पारिस्थितिक बदलाव लाया है।
वनस्पतियों और जैव-विविधता के विकास के साथ इस क्षेत्र की दीर्घकालिक स्थिति का भी आकलन किया जाएगा। यानी जिस जमीन पर कभी केवल राख दिखाई देती थी, अब वहां पेड़-पौधों के बीच जीवन की विविधता तलाशने की तैयारी है। एनटीपीसी कोरबा ने चारपारा राखड़ बांध के पुनर्वासित क्षेत्र में वनीकरण और जैव-विविधता विकास के अध्ययन का काम गुरु घासीदास विश्वविद्यालय को सौंपा है।
आठ सितंबर 2026 को 17.91 लाख रुपये की लागत से यह कार्य विश्वविद्यालय को दिया गया। अध्ययन की अवधि 460 दिन निर्धारित की गई है। इस दौरान क्षेत्र में विकसित वनस्पतियों, हरित आवरण और जैव-विविधता का सर्वे किया जाएगा।
अध्ययन का एक उद्देश्य यह समझना भी है कि राख से भरी भूमि के पुनर्वास के बाद वहां किस तरह का पारिस्थितिक तंत्र विकसित हुआ है। चारपारा में राख का भंडारण वर्ष 1984 में शुरू हुआ था। करीब 900 एकड़ क्षेत्र में फैला राखड़ बांध वर्ष 2000 में भर गया।
पर्यावरणीय दस्तावेजों के अनुसार उस समय यहां 55.64 मिलियन घन मीटर राख जमा हो चुकी थी। इसके बाद राख से भरे क्षेत्र के पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू की गई। राख की सतह को हरित क्षेत्र में बदलना इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा था।460 दिन तक चलने वाला अध्ययन पूरा होने के बाद चारपारा के इस कृत्रिम रूप से विकसित वन क्षेत्र की जैव-विविधता और पारिस्थितिक स्थिति की विस्तृत तस्वीर सामने आ सकेगी।
राख से भरी जमीन पर पौधों को विकसित करना सामान्य मिट्टी वाली भूमि की तुलना में अलग चुनौती थी। पुनर्वास के दौरान पौधों के विकास के लिए माइकोराइजल आर्गेनो-बायोफर्टिलाइजर का उपयोग किया गया। पर्यावरणीय निरीक्षण से जुड़े दस्तावेजों में करीब तीन लाख पौधों के रोपण और इको-पार्क विकसित किए जाने का उल्लेख मिलता है।
बाद के वर्षों में भी पौधरोपण और हरित क्षेत्र के विकास का काम जारी रहा। वर्तमान में चारपारा के पुनर्वासित क्षेत्र में 4.5 लाख से अधिक पौधे लगाए जा चुके हैं। राखड़ से ढका यह क्षेत्र पेड़-पौधों से घिरे भूभाग में बदल गया है।
कहीं पेड़ों का घनत्व बढ़ा है तो कहीं प्राकृतिक रूप से उगी वनस्पतियों ने जगह बनाई है। इसी बदलाव को अब वैज्ञानिक अध्ययन के माध्यम से दर्ज किया जाएगा। अध्ययन में यह देखा जाएगा कि लगाए गए पौधों के अलावा क्षेत्र में अन्य वनस्पतियों का विकास किस तरह हुआ है और वहां जैव-विविधता के कौन-कौन से संकेत मौजूद हैं।
विश्वविद्यालय की टीम चारपारा राखड़बांध क्षेत्र में वनस्पतियों की विविधता, हरित आवरण और जैव-विविधता से जुड़े पहलुओं का सर्वे करेगी। राख से पुनर्वासित भूमि पर तैयार हरित क्षेत्र की वर्तमान स्थिति और उसकी दीर्घकालिक स्थिरता का आकलन भी अध्ययन का हिस्सा होगा। इसके साथ ही क्षेत्र में विकसित पेड़-पौधों और अन्य वनस्पतियों की स्थिति दर्ज की जाएगी।
इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि पुनर्वास के बाद तैयार किए गए हरित क्षेत्र में जैविक विविधता किस स्तर तक विकसित हुई है। लंबे समय में यह क्षेत्र किस तरह बना रह सकता है, इसके लिए भी अध्ययन से जरूरी तथ्य सामने आएंगे। चारपारा के विकसित कृत्रिम जंगल क्षेत्र में एनटीपीसी प्रबंधन कॉटेज बनाने की तैयारी कर रहा है।
प्रस्तावित काटेज में अतिथि विश्राम कर सकेंगे। इसका उद्देश्य यहां आने वाले लोगों को राख से पुनर्वासित भूमि पर विकसित हरित क्षेत्र और कृत्रिम जंगल को करीब से देखने का अवसर देना है। जंगल के बीच विकसित हरियाली, पेड़-पौधों और प्राकृतिक वातावरण के बीच ठहरने की सुविधा मिलने से चारपारा क्षेत्र को प्रकृति आधारित स्थल के रूप में भी विकसित किया जा सकेगा।
