राष्ट्रवाणी: सिनेमा ने महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के जीवन के हर पहलू को पर्दे पर उतारा है और अब नए फिल्ममेकर …और पढ़ें भारतीय सिनेमा में महात्मा गांधी पर बनी कई फिल्में सुधीर मिश्रा की अपकमिंग फिल्म में मनोज बाजपेयी बने हैं महात्मा गांधी महात्मा गांधी को लेकर सुधीर मिश्रा का क्या है नजरिया?
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के व्यक्तित्व और विचारों को सिनेमा में अलग अलग तरीके से परखा गया है। पर्दे पर कभी वह आजादी की लड़ाई के सबसे बड़े नायक बनकर आए, कभी एक ऐसे पिता के रूप में, जिसकी निजी जिंदगी में कई रिश्ते अनसुलझे रह गए, तो कभी उनके विचारों ने आधुनिक दौर के एक आम इंसान को अपनी जिंदगी बदलने की राह दिखाई।
गांधी पर बनी फिल्मों का यह सफर उनके व्यक्तित्व के अलग-अलग रंगों को सामने लाता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (Mahatama Gandhi) भले ही सिनेमा के खास प्रशंसक नहीं रहे हों, लेकिन सिनेमा गांधी से कभी दूर नहीं रहा। हिंदी सिनेमा में समय-समय पर गांधी के जीवन, विचारों और व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं को पर्दे पर उतारा है।
कभी वह स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक के रूप में सामने आए, तो कभी एक पिता, विचारक और आम इंसान के रूप में। इस कड़ी में रिचर्ड एटनबरो निर्देशित गांधी (1982) में महात्मा गांधी के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को व्यापक स्तर पर प्रस्तुत किया गया था। यह फिल्म दक्षिण अफ्रीका में शुरुआती संघर्ष से लेकर भारत लौटने, स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व करने और 1948 में उनकी हत्या तक की यात्रा दिखाती है।
इसमें बेन किंग्सले ने गांधी की भूमिका निभाई थी। इसके करीब डेढ दशक बाद आई श्याम बेगनल (Shyam Benegal) निर्देशित ‘द मेकिंग ऑफ द महात्मा’ (The Making Of The Mahatma) में गांधीजी के पूरे जीवन के बजाय उनके दक्षिण अफ्रीका में बिताए करीब 21 सालों पर केंद्रित रही। इसकी कहानी 1893 से शुरू होती है जब मोहनदास करमचंद गांधी युवा बैरिस्टर के रूप में दक्षिण अफ्रीका जाते हैं और वहां उन्हें नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
श्याम बेनेगल ने गांधी को यहां एक ऐसे युवा के रूप में देखा, जो अनुभवों से सीखता है, खुद को बदलता है और धीरे-धीरे अपने विचारों को आकार देता है। यही वजह है कि फिल्म का टाइटल ‘द मेकिंग आफ द महात्मा’ रखा गया, यानी एक साधारण मोहनदास के धीरे-धीरे महात्मा गांधी बनने की कहानी। इसी तरह फिरोज अब्बास खान निर्देशित फिल्म ‘गांधी, माय फादर’ (Gandhi My Father) में महात्मा गांधी के राजनीतिक जीवन से ज्यादा उनके निजी जीवन और बड़े बेटे हरिलाल गांधी के साथ रिश्ते पर केंद्रित रही।
यह तीनों फिल्में मूल रूप से गांधी और उनके जीवन पर केंद्रित रही। वहीं, ‘सरदार’, ‘हे राम’, ‘द लेजेंड ऑफ भगत सिंह’ और ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ में गांधी की मौजूदगी कहानी को आगे बढ़ाने वाले महत्वपूर्ण प्रसंग के रूप में सामने आती है। इनमें लगे रहो मुन्ना भाई (Lage Raho Munna Bhai) सबसे सफल फिल्म रही है।
खास बात यह है कि यह फिल्म गांधी के जीवन की कहानी नहीं बताती, बल्कि आज के दौर में गांधी के विचारों को कैसे अपनाया जा सकता है, इसे हल्के-फुल्के और मनोरंजक अंदाज में दिखाती है। हाल के सालों में रिलीज फिल्म द बंगाल फाइल्स (The Bengal Files), स्वातंत्र्य वीर सावरकर, वेब सीरीज फ्रीडम एट मिड नाइट (Freedom At Midnight) के बाद अब एक बार फिर गांधी की कहानी की ओर फिल्ममेकर लौटे हैं।
हंसल मेहता की वेब सीरीज ‘गांधी’ इतिहासकार रामचंद्र गुहा की किताबों ‘गांधी बिफोर इंडिया’ और ‘गांधी: द इयर्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड’ पर आधारित है। ‘गांधी’ का प्रीमियर पिछले साल टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में हुआ था। तीन सीजन में गांधी की कहानी कहने को लेकर हंसल मेहता का कहना है कि अब तक गांधी पर बनी ज्यादातर कहानियां ‘महात्मा गांधी’ के बारे में थीं, जबकि उनकी सीरीज मोहनदास करमचंद गांधी की कहानी है।
उनका नजरिया शुरू से ही गांधी को पहले एक आम इंसान की तरह देखना और फिर उसी इंसान के भीतर छिपी महानता को तलाशना रहा। यानी उस लंबी और जटिल यात्रा को समझना, जिसने एक साधारण मोहनदास करमचंद गांधी (Mohandas Karamcand Gandhi) को वह व्यक्तित्व बनाया, जिसे दुनिया महात्मा गांधी के नाम से जानती है।
लंबा फार्मेट हंसल को इस यात्रा को विस्तार से तलाशने का अवसर देता है। इस सीरीज में गांधी की भूमिका निभा रहे प्रतीक गांधी रंगमंच पर करीब दस साल तक महात्मा गांधी की भूमिका निभाते रहे हैं। गांधी निभाने को लेकर उनका कहना है कि मैं जो नाटक करता हूं, वह करीब 100 मिनट का है।
सीरीज में हम मोहनदास करमचंद गांधी का पूरा जीवन दिखा रहे हैं। पहला सीजन साल 1888 से शुरू होता है, जब वह सिर्फ 18 साल के थे और यहीं से अपनी जिंदगी और खुद को तलाशने की उनकी यात्रा शुरू होती है। प्रतीक मानते हैं कि यह दुनिया की सबसे सार्वभौमिक और कालजयी कहानियों में से एक है, क्योंकि इसमें दिखाई गई परिस्थितियां और भावनाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।
दूसरा और तीसरा सीजन संभवत: मोहन से महात्मा बनने तक के बदलाव पर होगा। वहीं सुधीर मिश्रा निर्देशित फिल्म ‘गांधी एंड माय मदर’ में मनोज बाजपेयी पहली बार महात्मा गांधी की भूमिका निभा रहे हैं। सुधीर के मुताबिक गांधी का व्यक्तित्व इतना विराट है कि हर फिल्मकार उनकी कहानी को अपने नजरिए से कह सकता है।
अपनी फिल्म गांधी एंड माय मदर को लेकर सुधीर कहते हैं गांधी को अलग-अलग तरीके से आप बना सकते और बहुत तरीके से बनी भी हैं। तो फिर से वही रिपीट करने का तो फायदा है नहीं। हमारी फिल्म में कुछ नया अंदाज होगा।
कहानी है एक मां की जो अपने बेटे से कहती है एक फिल्म बनाओ गांधी पर। बेटा फिल्म बनाता है लेकिन इस प्रोसेस में मां बेटे के बीच मतभेद सामने आते हैं। बाकी फिल्म देखने पर पता चलेगा।
कुल मिलाकर गांधी का जीवन सिर्फ इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि हर दौर में उन्हें नए सवालों और नए नजरिए से समझने की कोशिश है। गांधी की सबसे बड़ी ताकत भी यही है कि समय बदलता रहा, लेकिन उनके आदर्शों की प्रासंगिकता बरकरार है।

