राष्ट्रवाणी: वैज्ञानिकों ने हेल चिकन की खोपड़ी में तीन ऐसी विशेषताएं पहचानीं जो इसे फल खाने वाला डायनासोर बताती हैं. शोधकर्ताओं के मुताबिक आज कुछ पक्षियों और कछुओं में इन खूबियों में से अलग-अलग विशेषताएं देखने को मिलती हैं. लेकिन इन तीनों का एक साथ मिलना खास है. इससे पता चलता है कि हेल चिकन की चोंच और जबड़े फल खाने के लिए बेहद अनुकूल थे. कई शाकाहारी डायनासोर भोजन को पीसने के लिए छोटे पत्थर निगलते थे. ये पत्थर उनके पेट में भोजन को पचाने और पीसने में मदद करते थे. लेकिन हेल चिकन का तरीका अलग दिखाई देता है. इसकी खोपड़ी और जबड़ों की बनावट से संकेत मिलता है कि यह भोजन को मुंह में ही चबाकर मसलता था. इससे वैज्ञानिकों को डायनासोर के भोजन पचाने के तरीकों में मौजूद अंतर समझने का नया मौका मिला है. इस खोज से एक और दिलचस्प सवाल उठा है. क्रिटेशियस काल के दौरान धरती पर फूल और फल देने वाले पौधे तेजी से फैल रहे थे. आज भी फल खाने वाले जीव एक जगह से दूसरी जगह बीज पहुंचाते हैं. इससे पौधों को नए इलाकों में फैलने में मदद मिलती है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि हेल चिकन और उसके करीबी जीव भी उस दौर में ऐसा करते होंगे. हालांकि इसकी पुष्टि के लिए अभी और सबूतों की जरूरत है. इस अध्ययन के सह-लेखक थॉमस डजियन के मुताबिक, ‘इन्फर्नोगैलस की खोज दिखाती है कि डायनासोर के भोजन की विविधता हमारी पहले की सोच से कहीं ज्यादा रही होगी.’ इस शोध के नतीजे ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ नाम की वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित हुए हैं. कुल मिलाकर यह खोज बताती है कि डायनासोर की दुनिया सिर्फ शिकारियों और शाकाहारी विशालकाय जीवों तक सीमित नहीं थी. वहां फल खाने वाला एक ऐसा छोटा डायनासोर भी था जिसकी चोंच उसे बाकी जीवों से बिल्कुल अलग बनाती थी. QR स्कैन करें, डाउनलोड करें News18 ऐप या वेबसाइट पर जारी रखने के लिए यहां क्लिक करें
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