नयी दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि गुजरात में 2002 में गोधरा कांड के बाद हुए दंगों को लेकर एक झूठी कहानी गढ़ने का प्रयास किया गया था और केंद्र की सत्ता में बैठे उनके राजनीतिक विरोधी चाहते थे कि उन्हें सजा मिले, लेकिन अदालतों ने उन्हें निर्दोष साबित किया. अमेरिका के जाने-माने पॉडकास्टर लेक्स फ्रीडमैन के साथ एक पॉडकास्ट में, मोदी ने कहा कि यह धारणा गलत सूचना फैलाने का एक प्रयास था कि 2002 के दंगे गुजरात में अब तक के सबसे बड़े दंगे थे.
उन्होंने कहा, ”अगर आप 2002 से पहले के आंकड़ों की समीक्षा करेंगे तो आप पाएंगे कि गुजरात में लगातार दंगे हुए. कहीं-कहीं तो लगातार कफ्र्यू लगाया जाता था. सांप्रदायिक हिंसा पतंगबाजी प्रतियोगिता या यहां तक कि साइकिल टक्कर जैसे छोटे मुद्दों पर भी भड़क जाया करती थी.” प्रधानमंत्री ने कहा कि 1969 में गुजरात में दंगे छह महीने से ज्यादा समय तक चले थे और उस समय वह राजनीतिक क्षितिज पर कहीं नहीं थे. मोदी ने कहा कि गोधरा ट्रेन अग्निकांड उनके गुजरात विधानसभा का सदस्य चुने जाने के मुश्किल से तीन दिन बाद हुआ.
उन्होंने कहा, ”यह अकल्पनीय त्रासदी थी, लोगों को जिंदा जला दिया गया. कंधार विमान अपहरण, संसद पर हमला या यहां तक कि 9/11 जैसी घटनाओं की पृष्ठभूमि में आप कल्पना कर सकते हैं और फिर इतने सारे लोगों को मार दिया गया और जिंदा जला दिया गया, आप कल्पना कर सकते हैं कि स्थिति कितनी तनावपूर्ण और अस्थिर थी.” उन्होंने कहा, ”ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए, हम भी ऐसा ही चाहते हैं. हर कोई शांति चाहता है.” उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री रहे मोदी ने कहा कि गोधरा में हुई बड़ी घटना चिंगारी फैलने का केंद्र बिंदु थी और फिर हिंसा हुई. उन्होंने कहा कि गोधरा मामले को लेकर फर्जी विमर्श गढ़ा गया.
उन्होंने कहा, ”लेकिन, अदालतों ने मामले की पूरी तरह से जांच की और हमें पूरी तरह से निर्दोष पाया. जो लोग वास्तव में जिम्मेदार थे, उन्हें अदालतों से सजा मिली.” प्रधानमंत्री ने कहा कि जब हिंसा हुई तब उनके राजनीतिक विरोधी केंद्र में सत्ता में थे और वे चाहते थे कि इन आरोपों पर उन्हें दंडित किया जा.
उन्होंने कहा, ”उस समय हमारे राजनीतिक विरोधी सत्ता में थे और स्वाभाविक रूप से वे चाहते थे कि हमारे खिलाफ सभी आरोप टिके रहें. वे हमें सजा मिलते देखना चाहते थे. उनके अथक प्रयासों के बावजूद, न्यायपालिका ने दो बार सावधानीपूर्वक स्थिति का विश्लेषण किया और अंतत? हमें पूरी तरह से निर्दोष पाया.” प्रधानमंत्री ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गुजरात, जहां लगभग हर साल हिंसा होती थी, वहां 2002 के बाद से दंगे नहीं हुए हैं. उन्होंने कहा, ”पिछले 22 साल में गुजरात में एक भी बड़ा दंगा नहीं हुआ.” मोदी ने कहा, ”गुजरात में पूरी तरह शांति है.” प्रधानमंत्री ने कहा कि उनका दृष्टिकोण हमेशा वोट बैंक की राजनीति से बचने का रहा है.
उन्होंने कहा, ”हमारा मंत्र रहा है, ‘सबका साथ सबका विकास और सबका प्रयास’. हम अपने पूर्वर्वितयों द्वारा अपनाई जाने वाली तुष्टीकरण की राजनीति को पीछे छोड़कर आकांक्षा की राजनीति की ओर बढ़ गए हैं.” उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि दंगों के बाद कुछ लोगों ने उनकी छवि खराब करने की कोशिश की, लेकिन अंतत: न्याय की जीत हुई और अदालतों ने उन्हें बरी कर दिया.
मैं खुद को धन्य मानता हूं कि मुझे संघ जैसे पवित्र संगठन से जीवन के मूल्य मिले: प्रधानमंत्री मोदी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोगों में देश के प्रति समर्पण का भाव भरने के मकसद से 1925 से लेकर अब तक काम करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की प्रशंसा की और कहा कि इसके जैसे ‘पवित्र’ संगठन से जीवन के मूल्य सीखकर वह खुद को धन्य महसूस करते हैं.
अमेरिकी पॉडकास्टर लेक्स फ्रीडमैन के साथ रविवार को एक पॉडकास्ट में चर्चा करते हुए मोदी ने कहा कि संघ ने उन्हें उनके जीवन का उद्देश्य दिया है और कहा कि इसके विभिन्न सहयोगी संगठन कई क्षेत्रों और समाज के हर वर्ग से जुड़े हैं. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने से पहले खुद आरएसएस प्रचारक रह चुके मोदी ने कहा कि वह युवावस्था में ही इस स्वयंसेवी संगठन से जुड़ गए थे क्योंकि गुजरात में उनके घर के पास स्थित आरएसएस की शाखा में गाए जाने वाले देशभक्ति गीतों ने उनके दिल को छुआ. आरएसएस के दर्शन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कोई कुछ भी करे लेकिन उसे देश के लिए काम करना चाहिए.
उन्होंने कहा, ”मैंने नहीं सुना कि आरएसएस जितना बड़ा कोई स्वैच्छिक संगठन है या नहीं.” उन्होंने कहा कि आरएसएस सिखाता है कि देश सर्वोपरि है और लोगों की सेवा करना भगवान की सेवा करने के समान है. उन्होंने कहा, ”मैं खुद को धन्य मानता हूं कि मुझे ऐसे पवित्र संगठन से जीवन के मूल्य मिले.” उन्होंने कहा कि बचपन में आरएसएस की शाखाओं में शामिल होना, उन्हें हमेशा अच्छा लगता था.
उन्होंने कहा, ”मेरे मन में हमेशा एक ही लक्ष्य था, देश के काम आना. यही मुझे संघ (आरएसएस) ने सिखाया है. आरएसएस की स्थापना के इस वर्ष 100 साल पूरे हो रहे हैं. दुनिया में आरएसएस से बड़ा कोई स्वयंसेवी संगठन नहीं है.” प्रधानमंत्री ने कहा कि आरएसएस को समझना कोई आसान काम नहीं है.
उन्होंने कहा, ”यह अपने स्वयंसेवकों को जीवन का एक उद्देश्य देता है. यह सिखाता है कि राष्ट्र ही सब कुछ है और समाज सेवा ही ईश्वर की सेवा है. हमारे वैदिक संतों और स्वामी विवेकानंद ने जो कुछ भी सिखाया है, संघ भी वही सिखाता है.” उन्होंने सेवा भारती, वनवासी कल्याण आश्रम और भारतीय मजदूर संघ जैसे संगठनों के व्यापक कार्यों का हवाला देते हुए कहा कि यह लोगों को समाज के लिए काम करने के लिए प्रेरित करता है.
मोदी ने कहा कि आरएसएस से संबद्ध विद्या भारती करीब 25 हजार स्कूलों का संचालन करती है और करोड़ों छात्रों ने किफायती दर पर यहां से शिक्षा प्राप्त की है. प्रधानमंत्री ने कहा कि वामपंथी संगठन श्रमिकों को एकजुट होने के लिए कहती हैं ताकि वे दूसरों से मुकाबला कर सकें, जबकि आरएसएस से प्रेरित श्रमिक संघ अपने कार्यकर्ताओं से दुनिया को एकजुट करने के लिए कहता है.
पाकिस्तान ने शांति के हर प्रयास का जवाब शत्रुता और विश्वासघात से दिया: प्रधानमंत्री मोदी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को कहा कि भारत की तरफ से शांति के हर प्रयास का जवाब पाकिस्तान ने शत्रुता और विश्वासघात से दिया और उम्मीद जताई कि उसे सद्बुद्धि आएगी और वह शांति का मार्ग अपनाएगा. लेक्स फ्रीडमैन के साथ एक पॉडकास्ट में उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय वैदिक संतों और स्वामी विवेकानंद ने जो कुछ भी सिखाया है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भी वही सिखाता है.
उन्होंने कहा, ”मैंने अपने शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान को आमंत्रित किया था, लेकिन शांति के हर प्रयास का जवाब शत्रुता और विश्वासघात से मिला. हम पूरी उम्मीद करते हैं कि पाकिस्तान को सद्बुद्धि आएगी और वह शांति का मार्ग अपनाएगा.” मोदी ने कहा कि उनका मानना है कि पाकिस्तान के लोग भी शांति चाहते हैं क्योंकि वे भी संघर्ष, अशांति और निरंतर आतंक में रहते हुए थक गए होंगे, जहां मासूम बच्चे भी मारे जाते हैं और अनगिनत जिंदगियां बर्बाद हो जाती हैं. प्रधानमंत्री ने कहा कि द्विपक्षीय संबंधों को सुधारने का उनका पहला प्रयास सद्भावना का संकेत था.
उन्होंने कहा, ”यह कूटनीतिक कदम था, जो दशकों में नहीं देखा गया. जिन लोगों ने कभी विदेश नीति के प्रति मेरे दृष्टिकोण पर सवाल उठाया था, वे उस समय अचंभित रह गए, जब उन्हें पता चला कि मैंने दक्षेस देशों के सभी राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया और हमारे तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने संस्मरण में उस ऐतिहासिक भाव को खूबसूरती से कैद किया है.” मोदी ने कहा कि यह इस बात का प्रमाण है कि भारत की विदेश नीति कितनी स्पष्ट और आश्वस्त हो गई है. उन्होंने कहा, ”इसने दुनिया को शांति और सद्भाव के लिए भारत की प्रतिबद्धता के बारे में एक स्पष्ट संदेश भेजा, लेकिन हमें वांछित परिणाम नहीं मिले.”
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत जब भी शांति की बात करता है] तो आज दुनिया उसकी बात सुनती है, क्योंकि भारत गौतम बुद्ध और महात्मा गांधी की भूमि है. उन्होंने कहा कि उनकी ताकत उनके नाम में नहीं है, बल्कि 1.4 अरब भारतीयों और देश की शाश्वत संस्कृति एवं विरासत के समर्थन में निहित है. आरएसएस के साथ उनके संबंधों के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में प्रधानमंत्री ने कहा कि वह खुद को भाग्यशाली मानते हैं कि उन्होंने ऐसे सम्मानित संगठन से जीवन के सार और मूल्यों को सीखा.
उन्होंने कहा, ”मुझे जीवन का उद्देश्य मिला.” उन्होंने कहा कि बचपन में आरएसएस की शाखाओं में शामिल होना, उन्हें हमेशा अच्छा लगता था. उन्होंने कहा, ”मेरे मन में हमेशा एक ही लक्ष्य था, देश के काम आना. यही मुझे संघ (आरएसएस) ने सिखाया है. आरएसएस की स्थापना के इस वर्ष 100 साल पूरे हो रहे हैं. दुनिया में आरएसएस से बड़ा कोई स्वयंसेवी संगठन नहीं है.” प्रधानमंत्री ने कहा कि आरएसएस को समझना कोई आसान काम नहीं है. उन्होंने कहा, ”यह अपने स्वयंसेवकों को जीवन का एक उद्देश्य देता है. यह सिखाता है कि राष्ट्र ही सब कुछ है और समाज सेवा ही ईश्वर की सेवा है. हमारे वैदिक संतों और स्वामी विवेकानंद ने जो कुछ भी सिखाया है, संघ भी यही सिखाता है.”
नतीजों से पता चलता है कि कौन सी टीम बेहतर है, भारत-पाक क्रिकेट प्रतिद्वंद्विता पर बोले मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय क्रिकेट टीम के हाल के वर्षों में अपने चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के खिलाफ दबदबा बनाए रखने के संदर्भ में रविवार को कहा कि वह क्रिकेट विशेषज्ञ नहीं हैं लेकिन नतीजों से पता चलता है कि कौन सी टीम बेहतर है. मोदी ने रविवार को अमेरिका के लोकप्रिय पॉडकास्टर लेक्स फ्राइडमैन के साथ बातचीत के दौरान अपने विचार साझा किए.
फुटबॉल के संदर्भ में उन्होंने महान डिएगो माराडोना को अपने जमाने का वास्तविक नायक करार दिया लेकिन साथ ही कहा कि वर्तमान पीढ़ी का पसंदीदा खिलाड़ी लियोनल मेस्सी है. भारत और पाकिस्तान की क्रिकेट टीमों के संदर्भ में मोदी ने कहा, ”’मैं कोई विशेषज्ञ नहीं हूं और मैं इस खेल के तकनीकी पक्षों के बारे में नहीं जानता. इसका जवाब केवल विशेषज्ञ ही दे सकते हैं लेकिन कुछ दिन पहले भारत और पाकिस्तान के बीच मैच खेला गया था. इसके नतीजे से पता चलता है कि कौन सी टीम बेहतर है. हम इसको इसी तरह से जानते हैं.” भारतीय क्रिकेट टीम ने हाल में चैंपियंस ट्रॉफी जीती थी और अपने अजेय अभियान की राह में पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी थी.
मोदी ने कहा, ”मुझे लगता है कि खेलों में पूरी दुनिया को ऊर्जावान बनाने की ताकत है. खेल की भावना विभिन्न देशों के लोगों को एक साथ जोड़ती है. इसलिए मैं कभी नहीं चाहूंगा कि खेलों को श्रेय ना दिया जाए. मैं वास्तव में मानता हूं कि खेल मानव विकास में प्रमुख भूमिका निभाते हैं, वे सिर्फ खेल नहीं हैं. वे लोगों को गहरे स्तर पर जोड़ते हैं. ” भारत में फुटबॉल की लोकप्रियता के संदर्भ में उन्होंने मध्य प्रदेश के शहडोल की अपनी यात्रा को याद किया, जहां उन्होंने निवासियों के बीच खेल के प्रति गहरा प्रेम देखा जो अपने क्षेत्र को ‘मिनी ब्राजील’ कहते थे. प्रधानमंत्री ने बिचारपुर के संदर्भ में यह बात कही.
मोदी ने कहा, ”शहडोल नाम का एक जिला है, जो पूरी तरह से आदिवासी क्षेत्र है, जहां आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं. जब मैंने वहां का दौरा किया, तो मैंने लगभग 80 से 100 युवा लड़कों और यहां तक कि अधिक उम्र के लोगों को देखा, जो सभी खेल की जर्सी पहने हुए थे.” प्रधानमंत्री ने कहा, ”मैंने उनसे पूछा कि आप सब कहां से हैं तो उन्होंने जवाब दिया हम मिनी ब्राजील से हैं. उन्होंने बताया कि उनके गांव में चार पीढि.यों से फुटबॉल खेला जा रहा है. यहां से लगभग 80 राष्ट्रीय स्तर के फुटबॉल खिलाड़ी निकले हैं और उनका पूरा गांव फुटबॉल के लिए सर्मिपत हैं.”
मोदी ने कहा, ”उन्होंने मुझे बताया कि उनके वार्षिक फुटबॉल मैच के दौरान आसपास के गांवों से लगभग 20,000 से 25,000 दर्शक देखने आते हैं.” मोदी से जब उनके पसंदीदा फुटबॉल खिलाड़ी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ”अगर हम अतीत की बात करें तो 1980 के दशक में एक नाम जो हमेशा सामने आता था वह माराडोना का था. उस पीढ़ी के लिए, उन्हें एक वास्तविक नायक के रूप में देखा जाता था. अगर आप आज की पीढ़ी से पूछेंगे, तो वे तपाक से कहेंगे (लियोनल) मेस्सी.”
भारत, चीन के बीच प्रतिस्पर्धा कभी संघर्ष में नहीं बदलनी चाहिए: प्रधानमंत्री मोदी
चीन के साथ पूर्व में तनाव के बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विवाद के बजाय बातचीत का समर्थन किया और कहा कि भारत और चीन के बीच मतभेद स्वभाविक हैं लेकिन मजबूत सहयोग दोनों पड़ोसियों के हित में है और यह वैश्विक स्थिरता के लिए भी आवश्यक है.
अमेरिकी पॉडकास्टर लेक्स फ्रीडमैन के साथ एक पॉडकास्ट में, मोदी ने कहा कि भारत और चीन सीमा पर 2020 में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर झड़पों से पहले वाली स्थितियों को बहाल करने के लिए काम कर रहे हैं. वर्ष 1975 के बाद पहली बार दोनों देशों के बीच टकराव ने संघर्ष का रूप ले लिया था. इस संघर्ष में दोनों पक्षों के जवानों की मौत हुई थी.
मोदी ने पिछले साल अक्टूबर में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के साथ अपनी बैठक का जिक्र करते हुए कहा, ह्लहालांकि, राष्ट्रपति शी के साथ हाल में हुई बैठक के बाद हमने सीमा पर सामान्य स्थिति की वापसी देखी है. हम अब 2020 से पहले की स्थितियों को बहाल करने के लिए काम कर रहे हैं.” उन्होंने कहा, ”धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से, विश्वास, उत्साह और ऊर्जा वापस आनी चाहिए. लेकिन स्वाभाविक रूप से, इसमें कुछ समय लगेगा, क्योंकि पांच साल हो गए हैं.” मोदी ने कहा कि भारत और चीन के बीच सहयोग न केवल दोनों देशों के लिए लाभकारी है, बल्कि वैश्विक स्थिरता और समृद्धि के लिए भी आवश्यक है.
उन्होंने कहा, ”चूंकि 21वीं सदी एशिया की सदी है, हम चाहते हैं कि भारत और चीन स्वस्थ और स्वाभाविक तरीके से प्रतिस्पर्धा करें. प्रतिस्पर्धा बुरी चीज नहीं है, लेकिन इसे कभी संघर्ष में नहीं बदलना चाहिए.” मोदी ने कहा कि भारत और चीन के बीच संबंध नए नहीं हैं क्योंकि दोनों देशों की संस्कृति और सभ्यताएं प्राचीन हैं.
उन्होंने कहा, ”आधुनिक दुनिया में भी, वे एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. यदि आप ऐतिहासिक रिकॉर्ड को देखें तो सदियों से भारत और चीन ने एक-दूसरे से सीखा है.” उन्होंने कहा, ”साथ मिलकर, उन्होंने हमेशा किसी न किसी तरह से वैश्विक भलाई में योगदान दिया है. पुराने रिकॉर्ड बताते हैं कि एक समय भारत और चीन अकेले दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रखते थे. भारत का कितना बड़ा योगदान था. मेरा मानना है कि गहरे सांस्कृतिक संबंधों के साथ हमारे संबंध बेहद मजबूत रहे हैं.” तीन घंटे से अधिक समय तक चली बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि अगर हम सदियों पीछे मुड़कर देखें तो भारत और चीन के बीच संघर्ष का कोई वास्तविक इतिहास नहीं है.
उन्होंने कहा, ”यह हमेशा एक-दूसरे से सीखने और एक-दूसरे को समझने के बारे में रहा है. एक समय चीन में बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव था और उस दर्शन का उद्भव भारत में हुआ.” उन्होंने कहा, ”भविष्य में भी हमारे संबंध उतने ही मजबूत रहने चाहिए और आगे बढ़ते रहने चाहिए. मतभेद स्वाभाविक हैं. जब दो पड़ोसी देश होते हैं, तो कभी-कभी असहमति होती है.” प्रधानमंत्री ने कहा कि परिवार में भी सब कुछ सही नहीं होता ह्ललेकिन हमारा प्रयास यह सुनिश्चित करना है कि मतभेद, विवाद में तब्दील नहीं होंह्व. उन्होंने कहा, ”इसलिए हम सक्रिय रूप से बातचीत की दिशा में काम कर रहे हैं. विवाद के बजाय, हम बातचीत पर जोर देते हैं, क्योंकि केवल बातचीत के माध्यम से हम एक स्थायी सहकारी संबंध का निर्माण कर सकते हैं जो दोनों देशों के सर्वोत्तम हितों को पूरा करता है.”
रूस-यूक्रेन संघर्ष तभी सुलझेगा जब दोनों पक्ष वार्ता करेंगे: प्रधानमंत्री मोदी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि रूस-यूक्रेन संघर्ष कभी भी युद्ध के मैदान में नहीं सुलझ सकता और इसका समाधान तभी होगा जब दोनों पक्ष वार्ता की मेज पर बैठेंगे. अमेरिकी पॉडकास्टर लेक्स फ्रीडमैन के साथ एक पॉडकास्ट में मोदी ने स्पष्ट किया कि इस संघर्ष में भारत तटस्थ नहीं है बल्कि शांति के लिए दृढ़ता से प्रतिबद्ध है.
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के साथ अपने अच्छे संबंधों पर प्रकाश डालते हुए मोदी ने कहा कि वह रूस से आग्रह कर सकते हैं कि युद्ध समाधान नहीं है और यूक्रेन को याद दिला सकते हैं कि युद्ध के मैदान से कभी समाधान नहीं निकलता.
उन्होंने कहा, ”रूस और यूक्रेन के साथ मेरे एक जैसे करीबी संबंध हैं. मैं राष्ट्रपति पुतिन के साथ बैठ सकता हूं और कह सकता हूं कि यह युद्ध का समय नहीं है. और मैं राष्ट्रपति ज.ेलेंस्की को दोस्ताना तरीके से यह भी बता सकता हूं कि भाई, दुनिया में चाहे जितने भी लोग आपके साथ खड़े हों, युद्ध के मैदान में कभी कोई समाधान नहीं निकलेगा.” प्रधानमंत्री दो युद्धरत देशों- रूस और यूक्रेन के बीच शांति कायम करने में मदद करने के बारे में एक सवाल का जवाब दे रहे थे.
उन्होंने कहा, ”कोई समाधान केवल तभी आएगा जब यूक्रेन और रूस दोनों बातचीत की मेज पर आएंगे. यूक्रेन अपने सहयोगियों के साथ अनगिनत चर्चाएं कर सकता है, लेकिन इसका कोई परिणाम नहीं होगा. चर्चा में दोनों पक्षों को शामिल किया जाना चाहिए.” प्रधानमंत्री ने कहा कि शुरुआत में शांति स्थापित करना चुनौतीपूर्ण था, लेकिन अब, मौजूदा स्थिति यूक्रेन और रूस के बीच सार्थक और प्रभावी वार्ता का अवसर प्रस्तुत करती है.
उन्होंने कहा, ”बहुत नुकसान हुआ है. यहां तक कि ग्लोबल साउथ को भी नुकसान हुआ है. दुनिया अन्न, ईंधन और खाद के संकट से जूझ रही है. इसलिए, वैश्विक समुदाय को शांति के लिए एकजुट होना चाहिए. जहां तक मेरी बात है, मैंने हमेशा कहा है कि मैं शांति के साथ खड़ा हूं. मैं तटस्थ नहीं हूं. मेरा एक रुख है, और वह शांति है, और मैं शांति के लिये प्रयास करता हूं.” प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि भगवान बुद्ध और महात्मा गांधी की भूमि भारत, संघर्ष से ऊपर शांति की वकालत करता है.
उन्होंने कहा, ”सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से हमारी पृष्ठभूमि इतनी मजबूत है कि जब भी हम शांति की बात करते हैं, दुनिया हमें सुनती है, क्योंकि भारत, गौतम बुद्ध और महात्मा गांधी की भूमि है.” उन्होंने कहा, ”हम सद्भाव का समर्थन करते हैं … हम न तो प्रकृति के खिलाफ युद्ध छेड़ना चाहते हैं और न ही राष्ट्रों के बीच संघर्ष को बढ़ावा देना चाहते हैं. हम शांति के लिए खड़े हैं और जहां भी हम शांतिदूत के रूप में कार्य कर सकते हैं, हमने खुशी से उस जिम्मेदारी को स्वीकार किया है.” मोदी ने यह भी कहा कि कोविड-19 के बाद ऐसा लग रहा था कि दुनिया एक साथ आ जाएगी, लेकिन इसके बजाय यह और अधिक खंडित हो गई, जिससे वैश्विक स्तर पर कई संघर्ष उभर आए.
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अप्रासंगिक हो गई हैं और संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन आवश्यक सुधार नहीं होने के कारण अपने उद्देश्य को पूरा करने में विफल हो रहे हैं. प्रधानमंत्री ने कहा, ”दुनिया को संघर्ष से दूर रहना चाहिए और समन्वय अपनाना चाहिए.” उन्होंने दोहराया कि प्रगति विकास से आएगी न कि विस्तारवाद से.
उन्होंने कहा, ”भारत हमेशा से बातचीत और कूटनीति के माध्यम से यूक्रेन संघर्ष के समाधान के लिए दबाव डालता रहा है.” पिछले साल नौ जुलाई को मॉस्को में पुतिन के साथ अपनी शिखर वार्ता में मोदी ने उनसे कहा था कि यूक्रेन संघर्ष का समाधान युद्ध के मैदान में संभव नहीं है और बमों तथा गोलियों के बीच शांति प्रयास सफल नहीं होते. इसके कुछ सप्ताह बाद वह यूक्रेन गए जहां उन्होंने जेलेंस्की से कहा कि यूक्रेन और रूस दोनों को चल रहे युद्ध को समाप्त करने के लिए समय बर्बाद किए बिना एक साथ बैठना चाहिए और भारत इस क्षेत्र में शांति बहाल करने के वास्ते एक ‘सक्रिय भूमिका’ निभाने के लिए तैयार है.

