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वक्फ संपत्तियों को गैर-अधिसूचित न करने का केंद्र का आश्वासन; याचिकाओं के जवाब के लिए सात दिन का समय

atulpradhanBy atulpradhanApril 18, 2025No Comments11 Mins Read
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वक्फ संपत्तियों को गैर-अधिसूचित न करने का केंद्र का आश्वासन; याचिकाओं के जवाब के लिए सात दिन का समय
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नयी दिल्ली. केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय को बृहस्पतिवार को आश्वस्त किया कि वह पांच मई तक “वक्फ बाय यूजर” समेत वक्फ की संपत्तियों को न तो गैर-अधिसूचित करेगी और न ही केंद्रीय वक्फ परिषद व बोर्ड में कोई नियुक्ति करेगी.
न्यायालय ने वक्फ संशोधन अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने के लिए केंद्र को सात दिन का समय दिया.

केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ को वक्फ संपत्तियों को पांच मई तक गैर-अधिसूचित न करने तथा केंद्रीय वक्फ परिषद व बोर्ड में कोई नियुक्ति न करने को लेकर आश्वस्त किया. मेहता ने शीर्ष अदालत को बताया कि “गहन चर्चाओं” के बाद संसद ने वक्फ संशोधन विधेयक पारित किया है और सरकार का पक्ष सुने बिना इसपर रोक नहीं लगाई जानी चाहिए.

केंद्र सरकार ने “वक्फ बाय यूजर” समेत वक्फ संपत्तियों को गैर-अधिसूचित करने के खिलाफ अंतरिम आदेश पारित करने और केंद्रीय वक्फ परिषदों व बोर्ड में गैर-मुस्लिमों को नियुक्त करने की अनुमति देने वाले प्रावधान पर रोक लगाने के उच्चतम न्यायालय के प्रस्ताव का भी कड़ा विरोध किया.

पीठ ने कहा, “सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि प्रतिवादी (भारत सरकार) सात दिन में संक्षिप्त जवाब देना चाहता है. उन्होंने आश्वासन दिया है कि सुनवाई की अगली तारीख तक (अधिनियम की) धारा नौ और 14 के तहत परिषद व बोर्ड में कोई नियुक्ति नहीं की जाएगी.” अदालत ने कहा कि मेहता ने यह भी कहा है कि सुनवाई की अगली तारीख तक, अधिसूचना के माध्यम से पहले से पंजीकृत या घोषित ‘वक्फ बाय यूजर’ समेत वक्फ संपत्तियों की स्थिति से छेड़छाड़ नहीं की जाएगी और उन्हें गैर-अधिसूचित नहीं किया जाएगा.

इसके बाद पीठ ने विवादास्पद वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर प्रारंभिक जवाब दाखिल करने के लिए केंद्र सरकार को एक सप्ताह का समय दिया और मामले की अगली सुनवाई के लिए पांच मई की तारीख तय की.
मेहता ने कहा, “यदि माननीय न्यायाधीश ‘वक्फ बाय यूजर’ के बारे में कुछ कहेंगे, तो इसका क्या परिणाम होगा?” उन्होंने कहा, “हम सरकार और संसद के रूप में जनता के प्रति जवाबदेह हैं.” प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि यदि किसी वक्फ संपत्ति का पंजीकरण 1995 के अधिनियम के तहत हुआ है, तो उन संपत्तियों को अगली सुनवाई तक गैर-अधिसूचित नहीं किया जा सकता.

उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को मामले की सुनवाई करते हुए अधिनियम के कुछ प्रमुख प्रावधानों पर रोक लगाने का प्रस्ताव रखा था. इनमें अदालतों द्वारा वक्फ घोषित की गईं संपत्तियों को गैर-अधिसूचित करने और केंद्रीय वक्फ परिषद व बोर्ड में गैर-मुस्लिमों की नियुक्ति का प्रावधान शामिल है. मेहता ने बृहस्पतिवार को पूछा कि क्या न्यायालय अधिनियम की कुछ धाराओं के प्रारंभिक अध्ययन के आधार पर अधिनियम पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रोक लगाने पर विचार कर सकता है.

मेहता ने कहा, “यदि माननीय न्यायाधीश किसी वैधानिक प्रावधान पर रोक लगाने पर विचार कर रहे हैं, तो यह अपने आप में असामान्य होगा. हमें माननीय न्यायाधीशों को कानून के इतिहास और उसके बाद संशोधन के बारे में बताना होगा.” उन्होंने कहा कि सरकार को कई ज्ञापन प्राप्त हुए, जिसके परिणामस्वरूप अंतत? संशोधित अधिनियम तैयार हुआ. उन्होंने कुछ उदाहरणों का हवाला दिया और कहा कि कई स्थानों पर निजी संपत्तियां वक्फ बताकर हड़प ली गईं.

मेहता ने इसे “विचार-विमर्श के बाद पारित किया गया विधेयक” बताते हुए कहा कि ये याचिकाएं राष्ट्रपति की ओर से अधिनियम को मंजूरी देने से पहले दायर की गई थीं और पीठ ने तुरंत इनपर विचार कर लिया. पीठ ने कहा, “हम इस मामले पर अंतिम निर्णय नहीं ले रहे.” मेहता ने कहा कि अधिनियम के प्रावधानों पर रोक लगाना एक “कठोर कदम” हो सकता है. उन्होंने कहा कि सरकार को अपना प्रारंभिक जवाब देने की अनुमति दी जानी चाहिए.

मेहता ने कहा, “मुझे एक सप्ताह के अंदर प्रारंभिक जवाब दाखिल करने की अनुमति दीजिए, और एक सप्ताह में कुछ भी नहीं बदलेगा.” एक राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा, “यदि एक या दो सप्ताह तक अंतरिम आदेश पारित नहीं किया गया तो आसमान नहीं गिर पड़ेगा.” मेहता ने कहा कि यदि कुछ राज्य न्यायालय के समक्ष नहीं भी पेश हुए तो भी उन राज्यों के वक्फ बोर्ड में नियुक्तियां नहीं की जाएंगी.

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “हम नहीं चाहते कि स्थिति बदले. कानून संसद बनाती है, कार्यपालिका निर्णय लेती है और न्यायपालिका व्याख्या करती है.” पीठ ने अपने समक्ष प्रस्तुत 72 याचिकाओं में से केवल पांच की ही सुनवाई करने का निर्णय लिया है. इस कानून के खिलाफ याचिका दायर करने वालों में एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी), जमीयत उलमा-ए-हिंद, द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक), कर्नाटक राज्य एयूक्यूएएफ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अनवर बाशा, कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी और मोहम्मद जावेद शामिल हैं.

इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से कपिल सिब्बल, अभिषेक सिंघवी और हुजेफा अहमदी समेत कई वरिष्ठ अधिवक्ता पेश हुए.
न्यायालय ने इन तीन वकीलों को नोडल वकील नियुक्त करते हुए उनसे कहा कि वे आपस में तय करें कि कौन दलीलें पेश करेगा.
याचिकाकर्ताओं को केंद्र सरकार से जवाब मिलने के पांच दिन के अंदर उसपर अपना जवाब दाखिल करने की अनुमति दी गई है.
पीठ ने कहा, “हम स्पष्ट करते हैं कि अगली सुनवाई (पांच मई) प्रारंभिक आपत्तियों और अंतरिम आदेश के लिए होगी.” पीठ ने कहा कि 1995 के वक्फ अधिनियम और 2013 में किए गए संशोधन को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका को अलग से वाद सूची में दर्शाया जाना चाहिए.

पीठ ने केंद्रीय वक्फ परिषद और बोर्ड में गैर-मुस्लिमों को नियुक्त करने के मामले पर बुधवार को नाराजगी जताई थी और केंद्र से पूछा था कि क्या वह हिंदू धार्मिक न्यासों में मुसलमानों को शामिल करने को तैयार है. प्रधान न्यायाधीश ने नोटिस जारी करने तथा अंतरिम आदेश पारित करने का प्रस्ताव रखते हुए कहा था कि इससे “निष्पक्षताएं संतुलित होंगी.” प्रधान न्यायाधीश ने आदेश का प्रस्ताव रखते हुए कहा था कि अधिनियम के कुछ प्रावधानों, विशेष रूप से न्यायिक रूप से मान्यता प्राप्त वक्फ संपत्तियों को कमजोर करने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं.

पीठ ने कहा था, ”अदालतों द्वारा वक्फ के रूप में घोषित संपत्तियों को वक्फ के रूप में गैर-अधिसूचित नहीं किया जाना चाहिए, चाहे वे ‘वक्फ बाय यूजर’ हों या विलेख द्वारा वक्फ हों, यद्यपि अदालत वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही है.” “वक्फ बाय यूजर” संपत्ति लंबे समय से धार्मिक या परोपकारी उद्देश्य से इस्तेमाल की जा रही संपत्ति होती है, जिसके लिए लिखित दस्तावेज या रजिस्ट्री की जरूरत नहीं होती. केंद्र सरकार ने पांच अप्रैल को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद अधिनियम को अधिसूचित किया था.

क्या मुस्लिम समुदाय को भारतीय उत्तराधिकार कानून के अंतर्गत लाया जा सकता है: न्यायालय करेगा विचार

उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को इस विवादास्पद मुद्दे पर विचार करने पर सहमति व्यक्त की कि क्या मुस्लिम समुदाय को पैतृक संपत्तियों और स्व-अर्जित संपत्तियों के मामले में शरीयत के बजाय धर्मनिरपेक्ष भारतीय उत्तराधिकार कानून के दायरे में लाया जा सकता है और साथ ही इससे उनकी आस्था पर भी असर न पड़े.

प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने केरल के त्रिशूर जिले के निवासी नौशाद के.के. की ओर से दायर याचिका पर संज्ञान लिया, जिसमें उन्होंने कहा कि वह धर्म के रूप में इस्लाम का त्याग किए बिना शरीयत के बजाय उत्तराधिकार कानून के तहत आना चाहते हैं. पीठ ने उनकी याचिका पर केंद्र और केरल सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा.

याचिका में कहा गया कि शरीयत के तहत एक मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति का केवल एक तिहाई हिस्सा ही वसीयत के माध्यम से दे सकता है तथा सुन्नी मुसलमानों में यह अधिकार गैर-उत्तराधिकारियों तक ही सीमित है. इसमें कहा गया, ”शेष दो-तिहाई हिस्सा निर्धारित इस्लामी उत्तराधिकार सिद्धांतों के अनुसार कानूनी उत्तराधिकारियों के बीच वितरित किया जाना चाहिए. इससे कोई भी विचलन, तब तक अमान्य माना जाएगा जब तक कि कानूनी उत्तराधिकारी सहमति न दें. वसीयत की स्वतंत्रता पर यह प्रतिबंध गंभीर संवैधानिक चिंताओं को जन्म देता है.” याचिका में तर्क दिया गया कि धार्मिक उत्तराधिकार नियमों का अनिवार्य अनुप्रयोग संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) जैसे प्रमुख प्रावधानों का उल्लंघन करता है.

इसमें कहा गया कि मुसलमानों को वसीयत बनाने की वही स्वतंत्रता नहीं दी जाती जो अन्य समुदायों के सदस्यों को दी जाती है, यहां तक ??कि धर्मनिरपेक्ष विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाह करने वाले मुसलमानों को भी यह स्वतंत्रता नहीं दी जाती तथा इससे मनमाना और भेदभावपूर्ण वर्गीकरण पैदा होता है.

याचिकाकर्ता ने विधायिका को यह निर्देश दिए जाने का अनुरोध किया कि वह धार्मिक पहचान के बावजूद सभी व्यक्तियों के लिए वसीयत संबंधी स्वायत्तता सुनिश्चित करने के वास्ते आवश्यक संशोधनों या दिशानिर्देशों को लागू करने पर विचार करे.
नोटिस जारी करते हुए पीठ ने इस याचिका को इसी मुद्दे पर लंबित समान मामलों के साथ संलग्न करने का आदेश दिया.

इससे पहले, पिछले साल अप्रैल में पीठ ने अलप्पुझा निवासी एवं ‘एक्स-मुस्लिम्स ऑफ केरल’ की महासचिव सफिया पी एम की याचिका पर विचार करने पर सहमति व्यक्त की थी. याचिका में कहा गया था कि वह एक नास्तिक मुस्लिम महिला हैं और वह अपनी पैतृक संपत्तियों का निपटान शरीयत के बजाय उत्तराधिकार कानून के तहत करना चाहती हैं. इसी तरह ‘कुरान सुन्नत सोसाइटी’ ने 2016 में एक याचिका दायर की थी जो शीर्ष अदालत में लंबित है. अब तीनों याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई होगी.

वक्फ पर विपक्ष बोला: उच्चतम न्यायालय से उम्मीद, भाजपा ने सात दिन के समय का स्वागत किया

विपक्षी दलों ने वक्फ (संशोधन अधिनियम) पर उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियों का स्वागत करते हुए बृहस्पतिवार को कहा कि इस विषय को लेकर देश की शीर्ष अदालत से उम्मीद जगी है, क्योंकि यह नया कानून सिर्फ धार्मिक अधिकारों पर ही नहीं, बल्कि संविधान की मूल आत्मा पर हमला है.

दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सांसद जगदंबिका पाल ने कहा कि विपक्षी दलों के याचिकर्ताओं ने अंतरिम आदेश के लिए दबाव बनाया, लेकिन शीर्ष अदालत ने सरकार को सात दिन का समय दिया, जो स्वागत योग्य कदम है. उच्चतम न्यायालय ने पांच मई तक ‘वक्फ बाय यूजर’ समेत वक्फ संपत्तियों को गैर-अधिसूचित नहीं करने और केंद्रीय वक्फ परिषद एवं वक्फ बोर्ड में नियुक्तियां न करने का केंद्र सरकार से आश्वासन लेने के साथ ही उसे संबंधित अधिनियम की वैधता पर जवाब दाखिल करने के लिए बृहस्पतिवार को सात दिन का समय दिया.

कांग्रेस नेता एवं वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने इस अधिनियम के माध्यम से किसी समुदाय नहीं, बल्कि संविधान की मूल आत्मा पर हमला किया है. सिंघवी ने संवाददाताओं से कहा, ”सरकार जिसे सुधार बता रही है, दरअसल वह अधिकारों पर प्रहार है. वक्फ अधिनियम प्रशासनिक कदम नहीं है, यह एक मूल वैचारिक हमला है.” उन्होंने दावा किया, ”कानून सुधार की भाषा में यह अधिनियम पूरी तरह से शत-प्रतिशत नियंत्रण की नीति लाने का प्रयास करता है. यह न सिफ.र् धार्मिक संस्थाओं पर चोट करता है, बल्कि अल्पसंख्यकों के आत्मनिर्णय, स्वायत्तता की भावना को कुचलता है. यह सत्ता की दखलंदाजी को सुशासन कहकर पेश करता है.” सिंघवी ने कहा कि कांग्रेस पार्टी चुप नहीं रहेगी और सड़क से लेकर संसद तक इस अधिनियम का विरोध करेगी.

उन्होंने आरोप लगाया कि वक्फ. अधिनियम एक लक्षित अतिक्रमण है तथा यह अधिनियम प्रशासनिक कार्यकुशलता के नाम पर स्थापित न्यायिक सिद्धांतों को कुचलता है. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उम्मीद जताई कि उच्चतम न्यायालय मुसलमानों के संवैधानिक अधिकारों पर गंभीरता से विचार करेगा.

उन्होंने ‘पीटीआई वीडियो’ से कहा, ”आज हमारी सबसे ज्यादा उम्मीद उच्चतम न्यायालय से है. जिस तरह की टिप्पणियां आईं हैं, उनको देखते हुए हमें उम्मीद है कि उच्चतम न्यायालय मुसलमानों और अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों पर विचार करेगा.” यादव ने आरोप लगाया कि भाजपा देश को संविधान से नहीं, बल्कि ‘मन विधान’ से चलाना चाहती है.

एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने संवाददाताओं से कहा, ”उच्चतम न्यायलय ने कहा है कि केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य वक्फ बोर्ड का गठन नहीं किया जाएगा और ‘वक्फ बाय यूजर’ को हटाया नहीं जा सकता. संयुक्त संसदीय समिति के विचार-विमर्श के दौरान मैंने सरकार द्वारा प्रस्तावित सभी संशोधनों का विरोध करते हुए कई सुझाव दिये थे और विधेयक पर संसद में चर्चा के दौरान मैंने इसे (विधेयक) असंवैधानिक बताया था.” उन्होंने कहा कि इस कानून के खिलाफ हमारी कानूनी लड़ाई जारी रहेगी.
आरएसपी के सांसद एनके प्रेमचंद्रन ने कहा कि उच्चतम न्यायालय का आदेश स्वागत योग्य कदम है और विपक्ष की नैतिक जीत भी है.

उन्होंने कहा कि संसद में चर्चा के दौरान विपक्ष ने जिन विषयों को उठाया था, उनका संज्ञान न्यायालय ने लिया, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार ने इन्हें नहीं सुना. भाजपा नेता और वक्फ संबंधी संसद की संयुक्त समिति के प्रमुख रहे जगदंबिका पाल ने कहा, ”याचिकाकर्ताओं के वकील बुधवार को अंतरिम आदेश के लिए दबाव बनाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन, वे इसे कानून के आधार पर नहीं समझा रहे थे. सरकारी पक्ष के वकील ने विस्तार से बताया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए इन मुद्दों पर संयुक्त संसदीय समिति की बैठक में पहले ही विचार किया जा चुका है.” उन्होंने कहा, ”दलीलें सुनने के बाद उच्चतम न्यायालय ने भारत सरकार और अन्य याचिकाकर्ताओं को सात दिन का समय दिया. हम इसका स्वागत करते हैं.”

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