राष्ट्रवाणी: रोहित कश्यप, मुंगेली। नगर पंचायत जरहागांव के नव नियुक्त एल्डरमेनों के शपथ ग्रहण को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच आखिरकार वही हुआ, जिसकी आशंका स्थानीय लोगों द्वारा जताई जा रही थी। नगर पंचायत जरहागांव के नव नियुक्त एल्डरमेन सतीश मशीह, चंद्रकांत वैष्णव और महावीर यादव ने अपने पद एवं गोपनीयता की शपथ नगर पंचायत जरहागांव में नहीं, बल्कि नगर पंचायत बरेला में रविवार को आयोजित समारोह में ली। शपथ ग्रहण के बाद यह पूरा मामला नगर में चर्चा और सवालों का विषय बन गया है। बरेला में आयोजित संयुक्त शपथ ग्रहण समारोह में एसडीएम ने तीनों एल्डरमेनों को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। कार्यक्रम में विधायक मोहले, जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीकांत पाण्डेय, प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। इसी समारोह में बरेला नगर पंचायत के नव नियुक्त एल्डरमेनों के साथ जरहागांव के एल्डरमेनों को भी शपथ दिलाई गई। हालांकि संवैधानिक प्रक्रिया पूरी हो गई, लेकिन इसने जरहागांव के लोगों के मन में कई सवाल छोड़ दिए। नगरवासियों का कहना है कि जिस नगर पंचायत के लिए एल्डरमेन नियुक्त किए गए, उनका पहला सार्वजनिक कार्यक्रम और शपथ ग्रहण भी उसी नगर में होना चाहिए था। स्थानीय जनता अपने जनप्रतिनिधियों को शपथ लेते देखना चाहती थी और यह जानना चाहती थी कि वे नगर के विकास और जनहित के लिए क्या संकल्प लेते हैं, लेकिन यह अवसर जरहागांव के लोगों को नहीं मिल सका। नगर में दिनभर यही चर्चा होती रही कि क्या नगर पंचायत जरहागांव में शपथ ग्रहण कराने के लिए संसाधनों की कमी थी, अथवा कार्यक्रम में शामिल होने वाले अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के पास इतना समय नहीं था कि वे संबंधित नगर पंचायत पहुंचकर स्थानीय जनता के बीच यह आयोजन कर पाते? लोगों का कहना है कि जब विकास कार्यों और नियुक्तियों का श्रेय लेने की बात आती है तो मंच सज जाते हैं, लेकिन जनप्रतिनिधियों के शपथ ग्रहण जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर अपने नगर में कार्यक्रम नहीं होना कई सवाल खड़े करता है। शपथ ग्रहण समारोह को लेकर एक और चर्चा पूरे दिन नगर में होती रही। जानकारी के अनुसार जरहागांव नगर पंचायत के आधा दर्जन से अधिक पार्षद इस कार्यक्रम में शामिल ही नहीं हुए। इसकी वजह को लेकर अलग-अलग चर्चाएं हैं। स्थानीय स्तर पर यह बात कही जा रही है कि कई पार्षदों को विधिवत आमंत्रण कार्ड नहीं मिला, जबकि कुछ लोग इसे नाराजगी से जोड़कर भी देख रहे हैं। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यह चर्चा पूरे नगर में बनी रही। यदि वास्तव में जनप्रतिनिधियों को समय पर आमंत्रण नहीं मिला, तो यह अपने आप में एक गंभीर सवाल है। वहीं यदि अन्य कारणों से पार्षद कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए, तब भी यह राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक नव नियुक्त एल्डरमेन ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर अपनी नाराजगी भी व्यक्त की। उन्होंने कहा कि “यह दुर्भाग्य की बात है कि जिस नगर पंचायत के लिए हमें नियुक्त किया गया, उसी नगर में हमारा शपथ ग्रहण नहीं हो सका। स्थानीय जनता के बीच यह कार्यक्रम होता तो अधिक अच्छा और गरिमापूर्ण होता।” हालांकि उन्होंने सार्वजनिक रूप से कोई आरोप लगाने से इनकार किया, लेकिन उनके इस बयान ने नगर में चल रही चर्चाओं को और हवा दे दी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि नगरीय प्रशासन मंत्री के गृह जिले में इस तरह की स्थिति कई सवाल खड़े करती है। लोगों का मानना है कि यदि बरेला में संयुक्त कार्यक्रम आयोजित किया जा सकता था, तो उसी प्रकार जरहागांव में भी अलग से शपथ ग्रहण समारोह आयोजित करने में कोई विशेष कठिनाई नहीं होनी चाहिए थी। फिलहाल शपथ ग्रहण की औपचारिकता पूरी हो चुकी है, लेकिन पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल पीछे छोड़ दिए हैं। जब नियुक्ति जरहागांव के लिए हुई थी, तो शपथ भी जरहागांव में क्यों नहीं हुई? क्या यह केवल प्रशासनिक सुविधा का मामला था या फिर स्थानीय जनता की सहभागिता को महत्व नहीं दिया गया? इन सवालों के जवाब भले अभी न मिले हों, लेकिन इतना तय है कि यह मामला नगर पंचायत जरहागांव में लंबे समय तक चर्चा और राजनीतिक कटाक्ष का विषय बना रहेगा। जरहागांव नगर क्षेत्र में इस फैसले को लेकर यह चर्चा भी हो रही है कि जब एक नगर पंचायत के एल्डरमेनों का शपथ ग्रहण दूसरे नगर पंचायत में कराया जा सकता है, तो इससे बेहतर व्यवस्था यह होती कि 25 जुलाई को जिला मुख्यालय मुंगेली में आयोजित उस शपथ ग्रहण समारोह में, जिसमें केंद्रीय राज्य मंत्री एवं उप मुख्यमंत्री अरुण साव शामिल हुए थे, जिले की सभी नगर पालिका एवं नगर पंचायतों में नियुक्त एल्डरमेनों को एक साथ शपथ दिला दी जाती। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि ऐसा किया जाता तो जिले के सभी नगरीय निकायों के एल्डरमेनों का शपथ ग्रहण एक ही मंच से संपन्न हो जाता। इससे प्रशासनिक अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और वरिष्ठ नेताओं का समय भी बचता, अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करने की आवश्यकता नहीं पड़ती और नगरीय निकायों पर होने वाला अतिरिक्त सरकारी खर्च भी कम होता। लोगों का कहना है कि इस तरह की व्यवस्था अधिक व्यावहारिक, सुव्यवस्थित और संसाधनों के बेहतर उपयोग वाली होती।
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