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हिंदू दर्शन यह नहीं कहता कि इस्लाम नहीं रहेगा, संघ किसी पर हमले में विश्वास नहीं रखता: भागवत

Team RashtrawaniBy Team RashtrawaniAugust 29, 2025No Comments15 Mins Read
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हिंदू दर्शन यह नहीं कहता कि इस्लाम नहीं रहेगा, संघ किसी पर हमले में विश्वास नहीं रखता: भागवत
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नयी दिल्ली/चेन्नई. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने बृहस्पतिवार को कहा कि संघ धार्मिक आधार पर किसी पर हमला करने में विश्वास नहीं रखता. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हिंदू दर्शन यह नहीं कहता कि इस्लाम नहीं रहेगा. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी समारोह के दौरान एक सवाल के जवाब में, भागवत ने कहा कि धर्म व्यक्तिगत पसंद का मामला है और इसमें किसी तरह का प्रलोभन या जोर-जबरदस्ती शामिल नहीं होनी चाहिए.

उन्होंने कहा, ”हिंदू आत्मविश्वास की कमी के कारण असुरक्षित हैं. कोई भी हिंदू यह नहीं सोचता कि इस्लाम नहीं रहेगा. हम पहले एक राष्ट्र हैं… आरएसएस किसी पर भी हमला करने में विश्वास नहीं रखता, धार्मिक आधार पर भी.” भागवत ने यह भी कहा कि सड़कों और जगहों का नाम ‘आक्रांताओं’ के नाम पर नहीं रखा जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, ”मैं यह नहीं कह रहा कि उनका नाम मुसलमानों के नाम पर नहीं रखा जाना चाहिए, लेकिन उनका नाम आक्रांताओं के नाम पर नहीं रखा जाना चाहिए.” भागवत ने कहा कि आरएसएस संविधान के तहत आरक्षण नीतियों का पूरा समर्थन करता है और जब तक जरूरत होगी, इस व्यवस्था का समर्थन करता रहेगा. जाति व्यवस्था पर, आरएसएस प्रमुख ने कहा कि जो भी पुराना हो गया है, वह खत्म हो जाएगा.

उन्होंने कहा, ”जाति व्यवस्था कभी थी, लेकिन आज उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है. जाति अब कोई व्यवस्था नहीं रही; यह पुरानी हो चुकी है और इसे खत्म होना ही होगा.” भागवत ने कहा, ”शोषण-मुक्त और समतावादी व्यवस्था के मूल्यांकन की आवश्यकता है. पुरानी व्यवस्था के खत्म होते ही यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इसका समाज पर विनाशकारी प्रभाव न पड़े.”

RSS प्रमुख ने गुरुकुल शिक्षा को मुख्यधारा में शामिल करने पर दिया जोर, NEP की सराहना की

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुकुल शिक्षा को मुख्यधारा की शिक्षा के साथ जोड़ने का आह्वान करते हुए बृहस्पतिवार को कहा कि गुरुकुल शिक्षा का मतलब आश्रम में रहना नहीं बल्कि देश की परंपराओं के बारे में सीखना है. आरएसएस के सौ साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह के दौरान एक सवाल पर भागवत ने कहा कि वह संस्कृत को अनिवार्य बनाने के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन देश की परंपरा और इतिहास को समझना महत्वपूर्ण है.

उन्होंने कहा, “वैदिक काल के प्रासंगिक 64 पहलुओं को पढ़ाया जाना चाहिए. गुरुकुल शिक्षा को मुख्यधारा में शामिल किया जाना चाहिए, न कि उसे प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए.” आरएसएस सरसंघचालक ने कहा कि मुख्यधारा को गुरुकुल शिक्षा से जोड़ा जाना चाहिए, जिसका मॉडल फिनलैंड के शिक्षा मॉडल के समान है.

उन्होंने कहा, ”शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी देश फिनलैंड में शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए एक अलग विश्वविद्यालय है. स्थानीय आबादी कम होने के कारण कई लोग विदेश से आते हैं, इसलिए वे सभी देशों के छात्रों को स्वीकार करते हैं.” उन्होंने कहा, “आठवीं कक्षा तक की शिक्षा छात्रों की मातृभाषा में दी जाती है… इसलिए गुरुकुल शिक्षा का मतलब आश्रम में जाकर रहना नहीं है, इसे मुख्यधारा से जोड़ना होगा.” नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) को सही दिशा में उठाया गया सही कदम बताते हुए भागवत ने कहा कि हमारे देश में शिक्षा प्रणाली बहुत पहले ही नष्ट हो गई थी.

उन्होंने कहा, “नयी शिक्षा प्रणाली इसलिए शुरू की गई क्योंकि हम हमेशा विदेशी आक्रमणकारियों के गुलाम रहे, जो उस समय के शासक थे. वे इस देश पर शासन करना चाहते थे, इसका विकास नहीं करना चाहते थे. इसलिए उन्होंने सभी प्रणालियां इस बात को ध्यान में रखते हुए बनाईं कि हम इस देश पर कैसे शासन कर सकते हैं…लेकिन अब हम आजाद हैं. इसलिए हमें केवल देश नहीं चलाना है, हमें लोगों को चलाना है.” आरएसएस प्रमुख ने कहा कि बच्चों को अतीत के बारे में सभी आवश्यक जानकारी दी जानी चाहिए, ताकि उनमें गर्व पैदा हो सके कि ”हम भी कुछ हैं, हम भी कुछ कर सकते हैं.” उन्होंने कहा, “हमने यह कर दिखाया है. यह सब बदलना ही था. पिछले कुछ सालों में थोड़ा बहुत बदलाव आया है और इसके बारे में जागरूकता बढ़ी है.”

धर्मांतरण और अवैध प्रवास जनसांख्यिकीय असंतुलन के प्रमुख कारण: भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने बृहस्पतिवार को जनसांख्यिकीय असंतुलन के पीछे धर्मांतरण और अवैध प्रवास को प्रमुख कारण बताया और कहा कि सरकार अवैध प्रवास को रोकने का प्रयास कर रही है, लेकिन समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी. आरएसएस के सौ साल होने के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह के दौरान एक प्रश्न के उत्तर में भागवत ने कहा कि धर्म व्यक्तिगत पसंद का विषय है और इसमें किसी प्रकार का प्रलोभन या जोर-जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए.

उन्होंने कहा, “धर्मांतरण और अवैध प्रवास जनसांख्यिकीय असंतुलन के प्रमुख कारण हैं. हमें अवैध प्रवासियों को नौकरी नहीं देनी चाहिए; हमें मुसलमानों सहित अपने लोगों को नौकरी देनी चाहिए.” आरएसएस सरसंघचालक से अवैध घुसपैठ पर संघ के विचार पूछे गए. उन्होंने कहा, “सरकार अवैध घुसपैठ पर नियंत्रण की कोशिश कर रही है, लेकिन समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी. धर्म व्यक्तिगत पसंद का विषय है; इसमें किसी तरह का प्रलोभन या जोर-जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए.”

आरएसएस शताब्दी समारोह में 24 दूतावासों के राजनयिक शामिल हुए 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी समारोह में बुधवार को लगभग 24 दूतावासों और उच्चायोगों के 50 से अधिक राजनयिकों ने भाग लिया. कार्यक्रम के दूसरे दिन उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों में अमेरिकी दूतावास के वरिष्ठ अधिकारी गैरी एप्पलगार्थ, एरोन कोप, चीनी दूतावास के झोउ गुओहुई, रूसी दूतावास से मिखाइल जायत्सेव, श्रीलंका के उच्चायुक्त प्रदीप मोहसिनी और मलेशिया के उच्चायुक्त दातो मुजफ्फर आदि शामिल थे.

उज्बेकिस्तान के काउंसलर उलुगबेक रिजेव, कजाकिस्तान के काउंसलर दिमासग सिज्दिकोव और इजराइल के राजदूत रूवेन अजार भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए. तीन दिवसीय कार्यक्रम मंगलवार को यहां विज्ञान भवन में शुरू हुआ जिसका जिसका विषय ”आरएसएस की 100 वर्ष की यात्रा: नए क्षितिज” है. व्याख्यान श्रृंखला के पहले दिन, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भारत के भविष्य के लिए अपने दृष्टिकोण और उसे आकार देने में स्वयंसेवियों की भूमिका पर प्रकाश डाला. कार्यक्रम के तीसरे दिन, वे प्रतिभागियों के प्रश्नों के उत्तर देंगे.

विदेशी प्रतिनिधियों के लिए भाषण का अंग्रेजी, फ्रेंच और स्पेनिश में सीधा अनुवाद किया गया. व्यापक जनसंपर्क अभियान के तहत, आरएसएस ने अपने शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में देशभर में एक लाख से अधिक ‘हिंदू सम्मेलनों’ समेत कई कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई है, जिसकी शुरुआत इस वर्ष दो अक्टूबर को विजयादशमी के दिन नागपुर में संगठन के मुख्यालय में भागवत के संबोधन से होगी. इसकी योजना अपने शताब्दी वर्ष के दौरान देशव्यापी घर-घर जनसंपर्क कार्यक्रम आयोजित करने की भी है.

हम फैसला नहीं करते, अगर करते तो क्या इतना समय लगता: नए भाजपा प्रमुख के चयन पर भागवत
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने इस आम धारणा को ”पूरी तरह गलत” बताते हुए खारिज कर दिया कि उनका संगठन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए ”सब कुछ” तय करता है. उन्होंने कहा कि सुझाव पार्टी को दिए जाते हैं, लेकिन फैसले पार्टी लेती है. भागवत ने यह भी कहा कि भाजपा के नए प्रमुख के चयन में आरएसएस की कोई भूमिका नहीं है.

विज्ञान भवन में आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला के अंतिम दिन सवालों के जवाब में भागवत ने कहा कि आरएसएस और भाजपा नीत सरकार के बीच कोई मतभेद नहीं है, चाहे वह केंद्र में हो या पार्टी द्वारा शासित राज्यों में. क्या संघ भाजपा के लिए हर चीज तय करता है, यहां तक कि अध्यक्ष का चयन भी, इस सवाल पर आरएसएस प्रमुख ने कहा, “यह पूरी तरह से गलत है.” जे पी नड्डा वर्तमान में भाजपा के अध्यक्ष हैं. वह केंद्रीय मंत्री भी हैं.

भागवत ने कहा, “हम फैसला नहीं करते. अगर हम फैसला कर रहे होते, तो क्या इसमें इतना समय लगता? हम फैसला नहीं करते. हमें फैसला करने की ज़रूरत नहीं है. अपना समय लीजिए. हमें इस बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है.” भागवत ने कहा कि आरएसएस के लिए भाजपा के संबंध में निर्णय लेना संभव नहीं है. उन्होंने कहा कि भाजपा के पास अपने मामलों को संभालने के लिए अपनी विशेषज्ञता है, जैसे आरएसएस के पास अपनी शाखाएं चलाने के लिए है.

भागवत ने कहा, “मैं पिछले 50 सालों से शाखाएं संचालित कर रहा हूं. अगर कोई मुझे शाखा संचालित करने की सलाह देता है, तो मैं उसका विशेषज्ञ हूं. वे कई वर्षों से सरकार चला रहे हैं. इसलिए वे सरकार मामलों के विशेषज्ञ हैं. हम एक-दूसरे की विशेषज्ञता जानते हैं.” आरएसएस प्रमुख ने कहा कि सुझाव दिए जा सकते हैं लेकिन निर्णय उन्हें ही लेना होगा क्योंकि यह उनका क्षेत्र है.

टीवीके प्रमुख विजय को आरएसएस से सीखना चाहिए: केंद्रीय मंत्री मुरुगन

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की तमिलनाडु इकाई के नेता एवं केंद्रीय राज्य मंत्री एल मुरुगन ने बृहस्पतिवार को कहा कि तमिलगा वेत्री कषगम के संस्थापक नेता विजय को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से सीखना चाहिए और फिर उसकी आलोचना करनी चाहिए. आरएसएस की प्रशंसा करते हुए मुरुगन ने कहा कि प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सबसे पहले आरएसएस के स्वयंसेवी ही मदद के लिए पहुंचते हैं और बदलाव के लिए समाज की भलाई का काम करते हैं.

मुरुगन ने संवाददाताओं से कहा कि चाहे 2004 की सुनामी हो, बाढ़ हो या कोरोना वायरस महामारी हो, आरएसएस के स्वयंसेवकों ने प्रभावित लोगों के लिए काम किया. उन्होंने कहा कि चाहे कोई भी प्राकृतिक आपदा हो, आरएसएस कार्यकर्ताओं ने जनता के लिए काम किया है. एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि अगर अन्नाद्रमुक ऐसे संगठन की आवाज सुनती है तो यह स्वागत योग्य है.

उन्होंने आरएसएस के बारे में कहा, ”यह 100 साल पुराना संगठन है जो सेवा के लिए प्रतिबद्ध है, यह एक स्वतंत्र संगठन है.” उन्होंने कहा कि अगर ऐसा संगठन किसी पार्टी का मार्गदर्शन करता है तो इसमें क्या गलत है. एक अन्य सवाल के जवाब में, मंत्री ने कहा कि विजय को आरएसएस से सीख लेनी चाहिए और उन्होंने इस सदियों पुराने संगठन के क्रमिक विकास का वर्णन किया. उन्होंने कहा, ”विजय को खुद को सुधारना चाहिए. विजय को आरएसएस से सीखना चाहिए.” मुरुगन ने कहा, ”इसके काम को देखिए, स्वच्छता और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में आदिवासियों के लिए किया गया काम; इसी तरह, अनुसूचित जातियों के लिए किया गया काम और जब भी प्राकृतिक आपदाएं आती हैं, तो आरएसएस कार्यकर्ता सबसे पहले मदद करने वालों में शामिल होते हैं. इसलिए, आरएसएस से सीखिए और फिर आलोचना कीजिए.”

तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) प्रमुख विजय ने 21 अगस्त को मदुरै में आयोजित अपनी पार्टी के दूसरे राज्य सम्मेलन को संबोधित करते हुए ”भाजपा के (अन्नाद्रमुक के साथ) गठबंधन” की आलोचना की थी. परोक्ष रूप से, उन्होंने अन्नाद्रमुक पर भ्रष्ट होने का भी आरोप लगाया था. उन्होंने भाजपा की आलोचना की थी और दावा किया था कि केंद्र में अपनी ‘अल्पमत’ सरकार चलाने के लिए उसने आरएसएस समेत अन्य दलों के साथ गठबंधन कर लिया है.

आरएसएस सरकार को यह नहीं बताता कि ट्रंप से कैसे निपटें: मोहन भागवत
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने बृहस्पतिवार को कहा कि संघ सरकार को यह नहीं बताएगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से कैसे निपटा जाए और वह उसके (सरकार के) निर्णय का समर्थन करेगा. उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी मित्रता पर दबाव नहीं होना चाहिए. भागवत ने तीन दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला के दौरान अंतरराष्ट्रीय व्यापार और अमेरिका द्वारा लगाए गए शुल्कों के बारे में पूछे गए प्रश्न का उत्तर देते हुए यह टिप्पणी की.

आरएसएस प्रमुख ने कहा, “अंतरराष्ट्रीय व्यापार आवश्यक है और होना ही चाहिए, क्योंकि यह देशों के बीच संबंधों को भी बनाए रखता है. लेकिन यह दबाव में नहीं होना चाहिए; दोस्ती दबाव में नहीं पनप सकती.” उन्होंने कहा, “यह मुक्त होना चाहिए, आपसी सहमति पर आधारित होना चाहिए. हमारा लक्ष्य आत्मनिर्भर होना चाहिए, साथ ही यह समझना चाहिए कि दुनिया परस्पर निर्भरता पर चलती है, और उसी के अनुसार कार्य करना चाहिए.” भागवत ने कहा, “हम सरकार को यह नहीं बताते कि ट्रंप से कैसे निपटना है; उन्हें पता है कि क्या करना है और हम उसका समर्थन करेंगे.” आरएसएस के सरसंघचालक की यह टिप्पणी ट्रंप द्वारा रूसी तेल की खरीद पर भारत पर लगाए गए अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क के लागू होने के एक दिन बाद आई है. इस तरह भारत पर कुल 50 प्रतिशत शुल्क लगाया गया है. भागवत ने बुधवार को कहा था कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार स्वेच्छा से होना चाहिए, किसी दबाव में नहीं. उन्होंने भारतीयों से स्वदेशी उत्पादों को अपनाने की अपील की थी.

काशी और मथुरा में आंदोलनों का समर्थन नहीं करेगा संघ, स्वयंसेवक भाग ले सकते हैं: भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने बृहस्पतिवार को घोषणा की कि राम मंदिर एकमात्र ऐसा आंदोलन था जिसका संघ ने समर्थन किया था और वह काशी और मथुरा सहित ऐसे किसी अन्य अभियान का समर्थन नहीं करेगा. यहां विज्ञान भवन में अपनी तीन दिवसीय व्याख्यान शृंखला के अंतिम दिन सवालों के जवाब में, भागवत ने स्पष्ट किया कि आरएसएस के स्वयंसेवक ऐसे आंदोलनों में शामिल होने के लिए स्वतंत्र हैं.

उन्होंने कहा, ”राम मंदिर एकमात्र ऐसा आंदोलन रहा जिसका आरएसएस ने समर्थन किया है, वह किसी अन्य आंदोलन में शामिल नहीं होगा, लेकिन हमारे स्वयंसेवक इसमें शामिल हो सकते हैं. काशी-मथुरा में आंदोलनों का संघ समर्थन नहीं करेगा, लेकिन स्वयंसेवक इसमें भाग ले सकते हैं.” यह व्याख्यान शृंखला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित की गई थी.

मैंने कभी नहीं कहा कि 75 साल में पद छोड़ दूंगा या किसी और को संन्यास ले लेना चाहिए: भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने बृहस्पतिवार को कहा कि उन्होंने कभी नहीं कहा कि वह 75 साल की उम्र में पद छोड़ देंगे या किसी को इस आयु में संन्यास ले लेना चाहिए. भागवत की इस टिप्पणी ने नेताओं के संन्यास लेने संबंधी उनकी हालिया टिप्पणी पर चल रही अटकलों पर विराम लगा दिया है, जिसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संदर्भ में देखा जा रहा था. मोदी और भागवत, दोनों अगले महीने 75 वर्ष के हो जाएंगे.

आरएसएस के शताब्दी वर्ष समारोह के दौरान प्रश्नों का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा, ”हम जीवन में किसी भी समय पद छोड़ने को तैयार हैं और जब तक संघ चाहे, तब तक कार्य करने को तैयार हैं.” 75 साल की उम्र में सेवानिवृत्ति या संन्यास के मुद्दे पर भागवत ने कहा कि उन्होंने हाल में नागपुर में दिवंगत आरएसएस नेता मोरोपंत पिंगले की विनोदप्रियता पर प्रकाश डालते हुए उनका उद्धरण दिया था.
भागवत ने कहा, ”वह इतने हास्य-विनोदी थे कि उनकी हाजिरजवाबी सुनकर आप अपनी कुर्सी पर उछल पड़ते थे… एक बार हमारे कार्यक्रम में, हम सभी अखिल भारतीय कार्यकर्ता थे और उन्होंने (पिंगले) अपने 70 वर्ष पूरे कर लिए थे. इसलिए उन्हें एक शॉल प्रदान किया गया और कुछ कहने को कहा गया…

उन्होंने खड़े होकर कहा, ‘आप सोच रहे होंगे कि आपने मुझे सम्मानित किया है, लेकिन मैं जानता हूं कि जब यह शॉल दिया जाता है तो इसका मतलब है कि आप शांति से कुर्सी पर बैठें और देखें कि क्या हो रहा है.” उन्होंने कहा, ”मैंने कभी नहीं कहा कि मैं पद छोड़ दूंगा या किसी और को संन्यास ले लेना चाहिए.” संघ प्रमुख ने कहा कि उनके संगठन में स्वयंसेवक को कार्य सौंपा जाता है, भले ही वे चाहें या ना चाहें. उन्होंने कहा, ”संघ हमें जो कहता है, हम करते हैं.”

एआई भाषाएं सीख सकता है, लेकिन क्या यह भावनाओं को समझ सकता है: मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने बृहस्पतिवार को कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) भाषाएं सीख सकती है लेकिन पूछा कि क्या यह भावनाओं को भी समझ सकती है. विज्ञान भवन में तीन दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला के अंतिम दिन एक प्रश्न के उत्तर में भागवत ने कहा कि संघ भी एआई को अपनाने की दिशा में आगे बढ. रहा है. उन्होंने कहा, “…इसके फायदे और नुकसान का अध्ययन करने के बाद… मुझे बताया गया है कि एआई का इस्तेमाल कविता लिखने के लिए किया जा सकता है… यह भाषाएं सीख सकता है, लेकिन क्या यह भावनाओं को समझ सकता है?” यह व्याख्यान श्रृंखला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित की गई थी.

भागवत ने अधिकतम तीन बच्चों, न्यूनतम तीन भाषाओं का समर्थन किया
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने बृहस्पतिवार को कहा कि सभी भारतीयों को कम से कम तीन भाषाएं आनी चाहिए, जिनमें उनकी मातृभाषा, उनके राज्य की भाषा और पूरे देश के लिए एक संपर्क भाषा शामिल होनी चाहिए, जो विदेशी नहीं हो सकती.

उन्होंने यह भी कहा कि जनसंख्या को पर्याप्त और नियंत्रण में रखने के लिए प्रत्येक भारतीय परिवार में तीन बच्चे होने चाहिए.
आरएसएस के सौ साल होने पर आयोजित व्याख्यानमाला के अंतिम दिन प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान उन्होंने कहा, “किसी सभ्यता को जीवित रखने के लिए, भारत की जनसंख्या नीति 2.1 (औसत बच्चों की संख्या) का सुझाव देती है, जिसका मूलत? अर्थ तीन बच्चे हैं. लेकिन संसाधनों का प्रबंधन भी करना होगा, इसलिए हमें इसे तीन तक सीमित रखना होगा.” भाषाओं के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि भारतीय मूल की सभी भाषाएं राष्ट्रीय भाषाएं हैं और इस पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए. उन्होंने कहा, “संवाद के लिए एक संपर्क भाषा होनी चाहिए, लेकिन वह विदेशी नहीं होनी चाहिए.” उन्होंने कहा, “सभी को मिलकर एक साझा संपर्क भाषा तय करनी चाहिए.” भागवत ने यह भी कहा कि आरएसएस अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा के खिलाफ नहीं है और लोगों को जितनी चाहें उतनी भाषाएं सीखने की स्वतंत्रता होनी चाहिए.

उन्होंने कहा, “जब मैं आठवीं कक्षा में था, तब मेरे पिताजी ने मुझे ‘ओलिवर ट्विस्ट’ और ‘द प्रिज.नर ऑफ. ज.ेंडा’ पढ.ने को कहा था. मैंने कई अंग्रेज.ी उपन्यास पढ.े हैं, लेकिन इससे मेरे हिंदुत्व प्रेम पर कोई असर नहीं पड़ा है.” भागवत ने कहा, “हमें अंग्रेज. बनने की ज.रूरत नहीं है, लेकिन अंग्रेज.ी सीखने में कोई बुराई नहीं है. एक भाषा के रूप में, इसका कोई बुरा असर नहीं है.” उन्होंने यह भी कहा कि भारत और उसकी परंपराओं को समझने के लिए संस्कृत भाषा का ज्ञान बहुत ज.रूरी है. हालांकि, भागवत ने कहा कि वह शिक्षा प्रणाली में किसी भी चीज को जबरन थोपने के ख.लिाफ. हैं.

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