युद्ध का डर कम होते ही गिरे कच्चे तेल के दाम, भारत समेत दुनिया को मिली बड़ी राहत-पिछले कुछ हफ्तों से ऊर्जा बाजार में तनाव का माहौल था, लेकिन अब धीरे-धीरे हालात सामान्य होते दिख रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया था, जो अब गिरावट की ओर बढ़ रहा है। गुरुवार को ब्रेंट क्रूड और वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) दोनों की कीमतें नीचे आईं। विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की आवाजाही सामान्य होने लगी है, जिससे आपूर्ति की चिंता कम हुई है और तेल के दाम भी नीचे आ रहे हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य हुई आवाजाही से बाजार को मिला भरोसा-होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है, जहां से खाड़ी क्षेत्र का बड़ा हिस्सा तेल दुनिया भर में पहुंचता है। अमेरिका-ईरान तनाव के दौरान इस मार्ग में रुकावट की आशंका ने तेल की कीमतों को बढ़ा दिया था। लेकिन अब टैंकरों की आवाजाही पहले से काफी हद तक सामान्य हो गई है, जिससे बाजार को भरोसा मिला है कि फिलहाल तेल आपूर्ति में कोई बड़ा संकट नहीं है। इसी भरोसे के चलते तेल की कीमतों में गिरावट आई है।

युद्ध के डर ने पहुंचाया था तेल को रिकॉर्ड स्तर पर-अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के दौरान निवेशकों को डर था कि खाड़ी से तेल की आपूर्ति बाधित हो सकती है। इस डर ने कच्चे तेल की कीमतों को 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचा दिया था, कुछ समय के लिए यह 126 डॉलर तक भी पहुंच गई थीं। उस वक्त बाजार में यह धारणा थी कि आपूर्ति में भारी कमी आ सकती है और दुनिया को तेल संकट का सामना करना पड़ सकता है। अब जब हालात सामान्य हो रहे हैं, तो कीमतें नीचे आ रही हैं।

तेल टैंकरों की वापसी से कम हुआ आपूर्ति संकट का खतरा-अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने बताया कि पिछले 24 घंटे में करीब 2 करोड़ बैरल तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरा है, जो सामान्य स्थिति की ओर लौटने का संकेत है। शिपिंग आंकड़ों में भी सकारात्मकता दिख रही है, जहां तीन बड़े टैंकर लगभग 50 लाख बैरल तेल लेकर जलडमरूमध्य से बाहर निकले हैं। इससे साफ हो गया है कि समुद्री गतिविधियां पटरी पर आ रही हैं। जब तेल का प्रवाह सुचारू होता है, तो बाजार में आपूर्ति बढ़ती है और घबराहट कम होती है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है कच्चे तेल की यह गिरावट-भारत दुनिया के बड़े तेल आयातकों में से एक है और अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में हर बदलाव सीधे भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। महंगे तेल से आयात बिल बढ़ता है और पेट्रोल-डीजल समेत ईंधन की कीमतें बढ़ती हैं, जिससे महंगाई पर असर पड़ता है। इस गिरावट से भारत को राहत मिली है, जिससे सरकार और तेल कंपनियों पर दबाव कम होगा। हालांकि यह राहत तब तक स्थायी नहीं होगी जब तक होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही बनी रहे।

ईरान से अतिरिक्त आपूर्ति की उम्मीद भी बना रही दबाव-बाजार में यह भी माना जा रहा है कि प्रतिबंधों में ढील मिलने के बाद ईरान से तेल की आपूर्ति बढ़ सकती है। इससे वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ेगी और कीमतें नीचे आएंगी। कई भौतिक तेल कार्गो छूट पर कारोबार करते देखे गए हैं, जो संकेत है कि आपूर्ति पर्याप्त है और संकट की संभावना कम है। निवेशक अब युद्ध की आशंकाओं से हटकर आपूर्ति की वास्तविक स्थिति पर ध्यान दे रहे हैं।

अमेरिका-ईरान समझौते पर टिकी है बाजार की नजर-हालांकि फिलहाल तेल बाजार में राहत है, लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच भविष्य के किसी भी समझौते पर नजर बनी हुई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर कोई अतिरिक्त शुल्क लगाया गया तो वे इसे स्वीकार नहीं करेंगे। यह मुद्दा वैश्विक ऊर्जा लागत को प्रभावित कर सकता है। इसलिए इस समझौते की दिशा और परिणाम पर पूरी दुनिया की नजर है।

आगे क्या रहेगा तेल बाजार का रुख?-ऊर्जा बाजार फिलहाल राहत की स्थिति में हैं, लेकिन पूरी तरह निश्चिंत नहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा और खुलापन, ईरान से जुड़े नीतिगत फैसले और वैश्विक राजनीतिक घटनाक्रम कीमतों की दिशा तय करेंगे। यदि आपूर्ति सामान्य बनी रही तो कीमतों में स्थिरता आएगी, लेकिन किसी नए तनाव से बाजार फिर तेजी पकड़ सकता है। फिलहाल भारत और दुनिया के लिए यह गिरावट राहत की खबर है।

 

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