जगदलपुर
छत्तीसगढ़ के माओवादी हिंसा प्रभावित बस्तर अंचल में माओवाद विरोधी अभियानों को अभूतपूर्व सफलता मिली है। राज्य सरकार की प्रभावी ‘माओवादी समर्पण नीति’ की बदौलत कांकेर और सुकमा जिलों में एक साथ 100 से अधिक माओवादियों ने हथियार डाल दिए हैं। इस सामूहिक आत्मसमर्पण को बस्तर में शांति की वापसी की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम माना जा रहा है।

कांकेर में शीर्ष कैडरों का समर्पण
कांकेर जिले के पखांजुर थाना क्षेत्र में सक्रिय 60 से अधिक माओवादियों ने पुलिस अधीक्षक के समक्ष आत्मसमर्पण किया। आत्मसमर्पण करने वालों में राजू सलाम, कमांडर प्रसाद और मीना सहित कई बड़े माओवादी भी शामिल हैं। अधिकारियों ने इस घटना को सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों से प्रभावित होकर मुख्यधारा में लौटने का परिणाम बताया। सभी समर्पित माओवादियों को सरकारी नीति के तहत नकद प्रोत्साहन, आवास और व्यावसायिक प्रशिक्षण पैकेज प्रदान किए जाएंगे।
 
सुकमा- 27 माओवादियों का आत्मसमर्पण, माओवादी मोर्चे पर बड़ी कामयाबी
सुकमा जिले में माओवादी विरोधी अभियान में बड़ी सफलता मिली है। कुल 27 सक्रिय माओवादियों ने हथियार डालकर आत्मसमर्पण कर दिया। इनमें दो हार्डकोर माओवादी शामिल हैं, जो पीएलजीए बटालियन-01 में सक्रिय थे। आत्मसमर्पित माओवादियों पर कुल 50 लाख रुपये का इनाम था, जिसमें एक पर 10 लाख, तीन पर 8-8 लाख, एक पर 3 लाख, दो पर 2-2 लाख और नौ पर 1-1 लाख रुपये का इनाम घोषित था। समर्पण करने वालों में 10 महिलाएं और 17 पुरुष शामिल हैं। इनमें एक सीवायसीएम, 15 पार्टी सदस्य और 11 अग्र संगठन से जुड़े सदस्य हैं।

यह आत्मसमर्पण सुकमा पुलिस मुख्यालय में बुधवार को आयोजित एक समारोह में हुआ। सुकमा एसपी सुनील शर्मा ने बताया कि छत्तीसगढ़ शासन की “आत्मसमर्पण पुनर्वास नीति” और “नियद नेल्ला नार योजना” के साथ-साथ अंदरूनी इलाकों में बढ़ते सुरक्षा कैंपों के दबाव ने माओवादियों को मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रेरित किया। इस सफलता में जिला बल, डीआरजी, विआशा, एसटीएफ, सीआरपीएफ की 02, 74, 131, 151, 216, 217 वाहिनी और कोबरा 203 बटालियन की महत्वपूर्ण भूमिका रही। आत्मसमर्पित माओवादियों ने संगठन में जबरन भर्ती, हिंसा और संसाधनों की कमी को समर्पण का कारण बताया।

शांति प्रक्रिया को मिली गति
यह सामूहिक आत्मसमर्पण इस बात का प्रमाण है कि माओवादियों की विचारधारा खोखली साबित हो रही है। अब तक 500 से अधिक माओवादियों का पुनर्वास किया जा चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन बड़े समर्पणों से बस्तर में विकास कार्य और शांति प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ेगी। यह न केवल सुरक्षा बलों की बड़ी जीत है, बल्कि उन स्थानीय समुदायों की भी जीत है, जो अब हिंसा मुक्त भविष्य की ओर देख रहे हैं। बस्तर अब ‘बंदूक’ नहीं, बल्कि ‘विकास’ की बात कर रहा है।



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