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Home»Country»सिंगूर में टाटा के लिए अधिकृत भूमि पूर्व में वहां काम करने वाली कंपनियों को नहीं दी जाएगी : न्यायालय
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सिंगूर में टाटा के लिए अधिकृत भूमि पूर्व में वहां काम करने वाली कंपनियों को नहीं दी जाएगी : न्यायालय

Team RashtrawaniBy Team RashtrawaniOctober 13, 2025No Comments4 Mins Read
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सिंगूर में टाटा के लिए अधिकृत भूमि पूर्व में वहां काम करने वाली कंपनियों को नहीं दी जाएगी : न्यायालय
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नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को पश्चिम बंगाल सरकार को राहत देते हुए फैसला दिया कि सिंगूर में टाटा मोटर्स की ‘नैनो’ कार परियोजना के लिए अधिग्रहित भूमि उन औद्योगिक संस्थाओं को वापस नहीं की जाएगी जो अधिग्रहण से पहले वहां काम कर रही थीं. न्यायमूर्ति सूर्यकांत एवं न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने केदार नाथ यादव मामले में शीर्ष अदालत के 2016 के फैसले की व्याख्या की. उक्त फैसले में टाटा मोटर्स के विनिर्माण संयंत्र की स्थापना के लिए भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही को रद्द कर दिया गया था.

पीठ ने कहा कि 2016 का निर्णय आधार था कि अधिग्रहण से कमजोर समुदाय असमान रूप से प्रभावित हुए, जो सरकारी कार्रवाई को चुनौती देने के लिए वित्तीय संसाधन और संस्थागत पहुंच में सक्षम नहीं थे. पीठ ने कहा कि इस न्यायालय ने राज्य को 12 सप्ताह के भीतर मूल भूस्वामियों/कृषकों को भूमि वापस करने का निर्देश दिया था.

शीर्ष अदालत ने 2016 के अपने फैसले की व्याख्या करते हुए कहा, ”असाधारण न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता तब होती है जब व्यवस्थागत बाधाएं कुछ वर्गों को सामान्य उपचारों तक पहुंचने से रोकती हैं, न कि तब जब पक्षों के पास अपने अधिकारों की रक्षा के लिए पर्याप्त साधन हों. वंचितों की मुफलिसी की प्रक्रिया को रोकने के लिए दी गई राहत, वित्तीय क्षमता और संस्थागत विशेषज्ञता रखने वाले वाणिज्यिक उद्यमों को नहीं दी जा सकती.”

शीर्ष अदालत ने यह आदेश राज्य सरकार की उस याचिका पर दिया जिसमें कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी गई थी. उच्च न्यायालय ने राज्य को निर्देश दिया था कि वह मेसर्स सैंटी सेरामिक्स प्राइवेट लिमिटेड को सभी संरचनाओं सहित 28 बीघा जमीन लौटा दे. यह कंपनी टाटा की नैनो परियोजना के लिए 2006 में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया से पहले सिंगूर में सिरेमिक विद्युत इन्सुलेटर के उत्पादन के लिए एक फैक्टरी का संचालन कर रही थी.

शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के फैसले को रद्द करते हुए कहा, ”जब अधिग्रहण अनिवार्य सुरक्षा उपायों को दरकिनार कर देता है, तो पूरी तरह से विरासत में मिली ज़मीन पर निर्भर रहने वाले सीमांत किसान गरीबी का सामना करते हैं.उनके पास कोई वैकल्पिक आजीविका नहीं होती, प्रशासनिक प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए संसाधनों की कमी होती है या लंबी मुकदमेबाजी का खर्च वहन करने की क्षमता नहीं होती. इस अदालत द्वारा प्रदान किया गया उपाय इस संरचनात्मक खामी को दूर करता है.”

पीठ की ओर से फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि वर्गीकरण का निर्णायक कानूनी महत्व है और सभी प्रभावित पक्षों को स्वत: बहाली प्रदान करने के बजाय संरचनात्मक रूप से कमजोर को राहत प्रदान करके, इस न्यायालय ने 2016 में भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही में अंतिमता को कमजोर करने से रोका, जबकि वास्तव में कमजोर लोगों के लिए सुरक्षा सुनिश्चित की.

पीठ ने रेखांकित किया, ”इस पृष्ठभूमि में, हमें यह मानने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि प्रतिवादी संख्या 1 (सैंटी सेरामिक्स) इस न्यायालय द्वारा परिकल्पित सुरक्षात्मक ढांचे से पूरी तरह बाहर है. अपनी एकमात्र आजीविका के नुकसान से संभावित विपन्नता का सामना कर रहे सीमांत किसानों के विपरीत, प्रतिवादी संख्या 1 ने 2003 से 100 से अधिक श्रमिकों को रोजगार देते हुए 60,000 वर्ग फुट का विनिर्माण संयंत्र संचालित किया है, और कृषि भूमि को वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए खरीदा और परिर्वितत किया है.”

शीर्ष अदालत ने सैंटी सेरामिक्स को तीन महीने के भीतर संबंधित भूमि से शेष संरचनाओं, मशीनरी को हटाने की अनुमति दे दी है, या वैकल्पिक रूप से वह राज्य के अधिकारियों से संरचनाओं, मशीनरी और अन्य चल और अचल वस्तुओं को सार्वजनिक नीलामी के लिए रखने का अनुरोध कर सकती है. पीठ ने कहा कि नीलामी प्रक्रिया पर हुए व्यय को घटाने के बाद सैंटी सेरामिक्स को नीलामी की आय प्राप्त करने का अधिकार होगा.

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