राष्ट्रवाणी: भारतीय सिनेमा में ‘खलनायक’ फिल्मों का अहम हिस्सा रहे हैं। हालांकि, खलनायिकी की ये परंपरा किसने शुरू की और आखिर 100 सालों में खलनायक कितना बदल गए हैं, जानिए… एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। 1913 में भारतीय सिनेमा की शुरुआत हुई।
जिस तरह एक फिल्म के लिए हीरो-हीरोइन अहम होते हैं, उसी तरह खलनायक भी फिल्मों के लिए अहम रहे हैं। 100 साल पहले हीरालाल ठाकुर (Hiralal Thakur) ने खलनायक बनने की परंपरा शुरू की। जिस दौर में हर किसी को हीरो बनना था, उस वक्त हीरालाल खलनायक बनने सिनेमा में आए।
फिल्मों में अपनी खलनायिकी से उन्होंने सफलता हासिल की। हीरालाल के बाद सिनेमा को एक से बढ़कर एक खलनायक मिले। खलनायक फिल्मों का अहम हिस्सा बन गया।
मगर बदलते सिनेमा में खलनायकों में तब्दीली आने लगी। पहले दौर से अब खलनायक बहुत अलग हो गए हैं। कभी जमींदार तो कभी रसूखदार जैसे खलनायकों ने गरीबों पर जुल्म ढहाने के लिए जाने गए, मगर आज के खलनायक हाथों में बंदूक लेकर खून-खराबा करने के लिए जाने जाते थे।
चलिए आपको बताते हैं कि 100 सालों में सिनेमा में खलनायक कैसे बदल गए… खलनायिकी का सिलसिला साइलेंट फिल्मों से अपना करियर शुरू करने वाले अभिनेता हीरालाल (Hiralal) ने शुरू की थी। फिल्मों में उनकी खलनायिकी इतनी जबरदस्त थी कि उन्हें ‘इंडियन सिनेमा का बैड मैन’ कहा जाने लगा। इसके बाद सिनेमा में कई खलनायक आए।
50 के दशक में खलनायक हाथ में बंदूक लिए नहीं घूमते थे। उस वक्त पैसा और पावर ही खलनायकों का हथियार हुआ करता था। 1953 में आई फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ को ही ले लीजिए।
इस फिल्म में खलनायक कोई गुंडा या डाकू नहीं, बल्कि एक जमींदार था। जो दो बीघा जमीन के लिए किसान पर जुल्म ढहाता था। 50s में ज्यादातर फिल्मों में जमींदार, रसूखदार या फिर गांव के प्रधान जैसे खलनायक देखने को मिलते थे।
Balraj Sahni and Murad In Do Bigha Zamin- IMDb फिर 60 का दशक शुरू हुआ और खलनायिकी में बदलाव देखने को मिला। रंगीन फिल्मों में खलनायक भी हैंडसम हो गया। इस दौर में प्राण (Pran), अजीत और जीवन (Jeevan) जैसे खलनायक आए।
वह किसी जमींदार या रसूखदार बनने से ज्यादा सूट-बूट में पढ़े-लिखे स्टाइल मारते हुए खलनायक बने। उनका रुतबा हीरो से कम नहीं था। 70s के आते-आते खलनायक करप्ट अधिकारी, सत्ताधारी, शोषण करने वाला, बेरहम मिल मालिक बन गए।
70s के दौर में कई खलनायक आए जिन्होंने रातोंरात पहचान बना ली। फिल्म जंजीर में तेजा बने अजीत कूल खलनायक बने जिनका डायलॉग ‘मोना डार्लिंग’ आज भी हिट है। फिर शोले (Sholay) में खलनायक के रूप में गब्बर सिंह मिला जो एक डाकू था।
एक ऐसा बेरहम गब्बर जो हाथों में बंदूक लिए घूमता था। वह ठाकुर के हाथ काटने को एन्जॉय करता था। उसने दहशत फैलाई।
वह 50s और 60s के डाकुओं से एकदम अलग था। हालांकि, इस दौर में खलनायकों की पॉपुलैरिटी हीरो से भी ज्यादा हुआ करती थी। वे स्टार बन गए थे।
जनता के दिलों में नफरत भरकर उन्होंने स्टारडम हासिल की थी। इसी तरह 80s में खलनायिकी बदली। इस दौर में जिस तरह भारतीय राजनीति में तब्दीली आ रही थी, उसी तरह सिनेमा में खलनायिकी बदल रही थी।
फिल्मों में खलनायक राजनीति से निकल रहे थे, वहीं कुछ अंडरवर्ल्ड डॉन थे। इस दौर में रामा शेट्टी, सदाशिव अमरापुरकर, अमरीश पुरी और ओम पुरी जैसे खलनायकों ने दर्शकों के दिलों में दहशत फैलाई। 90s के दौर में न केवल खलनायक बदले, बल्कि इनकी परिभाषा भी बदल गई।
पहले के दौर में हीरो अलग और खलनायक अलग थे। मगर 90s में हीरो ही खलनायक बन गया। कभी दर्शकों के दिलों में नफरत भरने वाले खलनायक अब थोड़ी सहानुभूति भी बटोरने लगे।
फिल्म बाजीगर और डर को ही ले लीजिए। बाजीगर में शाह रुख खान एंटी-हीरो के रोल में दिखे। उन्होंने पिता की मौत का बदला लेने के लिए कई लोगों की हत्या की।
फिर डर आया जिसमें शाह रुख कोई हाथ में हथियार लिए गुंडे, जमींदार या फिर कोई क्रूर बिजनेसमैन नहीं, बल्कि एक साइको बने जो अपने प्यार को पाने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार था। फिर संजय दत्त आए, उन्होंने भी खलनायक मूवी में एंटी हीरो का किरदार निभाया। 2000 के दौर में खलनायिकी फिल्मों से लगभग गायब हो गई थी।
यह दौर किसी बड़ी एक्शन फिल्मों के लिए नहीं, बल्कि रोमांटिक, कॉमेडी और सामाजिक मुद्दों को दिखाने वाली फिल्मों के लिए जाना गया। यहां कोई शख्स खलनायक नहीं था, बल्कि परिस्थिति ही खलनायक बन गई। इस दौर में रंग दे बसंती, 3 इडियट्स, सितारें जमीन पर, बागबान जैसी फिल्मों ने कदम रखा।
2010 के बाद एक बार फिर से फिल्मों में खलनायक लौट रहे हैं। अब एंटी-हीरो के साथ-साथ सिनेमा को क्रूर खलनायक भी मिल रहे हैं। इस दौर में अलग-अलग खलनायिकी देखने को मिल रही।
अग्निपथ के कांचा चीना (संजय दत्त) की तरह खलनायक डरा भी रहे हैं और रमन राघव 2.0 में सीरियल किलर बनकर छुपकर वार भी कर रहे हैं। फिल्मों में अब खलनायिकी की क्रूरता बढ़ती जा रही है। सरेआम खून-खराबा, धड़ाधड़ बंदूकें चलाई जा रही हैं।
एनिमल में अबरार (बॉबी देओल) और धुरंधर में रहमान डकैत की क्रूरता देखने को मिली। अब खलनायक बेरहमी से हत्या कर रहे हैं, सिर काट रहे हैं। यश स्टारर फिल्म टॉक्सिक में भी खूब खून खराबा देखने को मिला।
वक्त के साथ-साथ खलनायिकी काफी बदल गई। हर दौर में हमें अलग-अलग विलेन देखने को मिले और यह सिलसिला हर बदलते वक्त के साथ जारी रहेगा।
