राष्ट्रवाणी: वेदांत सिंह और सात्विक कपूर ने Morsa एआई सॉफ्टवेयर विकसित किया। Morsa ने 1.5 मिलियन डॉलर (14 करोड़) की प्री-सीड फंडिंग जुटाई। बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| एक तरफ लखनऊ के 19 साल का वेदांत सिंह, जिन्होंने महज 13 साल की उम्र में कोडिंग शुरू कर दी थी, तो दूसरी तरफ दिल्ली के 22 साल के सात्विक कपूर।
दोनों ने मिलकर ऐसा एआई सॉफ्टवेयर बनाया है, जो फैक्ट्री में सिर्फ समस्याएं ही नहीं बताता, बल्कि यह भी तय करता है कि अगला काम किसे करना है और फिर उसके पूरा होने तक फॉलो-अप भी लेता है। दोनों युवाओं के इसी स्टार्टअप लूनर इंक ने 15 लाख डॉलर यानी करीब 14 करोड़ रुपए की प्री-सीड फंडिंग जुटाई गई है।
फंडिंग राउंड का नेतृत्व जैक्सन स्क्वायर वेंचर्स ने किया है। Morsa का काम यहीं शुरू होता है। यह अलग-अलग संदेशों और सिस्टम में मौजूद जानकारी को जोड़कर समझने की कोशिश करता है कि समस्या क्या है, उसका असर किस काम पर पड़ेगा और अगला कदम किसे उठाना चाहिए।
वेदांत ने जागरण बिजनेस से खास बातचीत में बताया कि, Morsa को इसी मौजूदा सिस्टम के साथ जोड़ा गया। कंपनी के मुताबिक, कर्मचारियों को कोई नया ऐप डाउनलोड नहीं करना पड़ा, कोई नया डैशबोर्ड सीखना नहीं पड़ा और ERP को बदलना भी नहीं पड़ा। यह आंकड़ा कंपनी और उसके ग्राहक की ओर से रिपोर्ट किया गया है।
इसे किसी स्वतंत्र संस्था के ऑडिट किए हुए नतीजे के तौर पर पेश नहीं किया गया है। सात्विक कपूर और वेदांत सिंह की मुलाकात टेक की दुनिया में हुई। दोनों ने साथ में एक हैकाथॉन में हिस्सा लिया और इसके बाद ओपन-सोर्स प्रोजेक्ट्स पर काम किया।
सात्विक कपूर की प्रोफाइल के मुताबिक, दोनों ने YC से जुड़े एक हैकाथॉन में साथ काम किया और जीत हासिल की। इसके बाद दोनों ने कंपनी शुरू करने से पहले 200 से ज्यादा कस्टमर इंटरव्यू किए। सात्विक का मैन्युफैक्चरिंग से सीधा कनेक्शन भी रहा है।
Morsa की वेबसाइट पर वे बताते हैं कि उन्होंने अपने परिवार के मैन्युफैक्चरिंग कारोबार में करीब एक दशक बिताया और फैक्ट्री फ्लोर पर इस तरह की समस्याओं को करीब से देखा। वेदांत सिंह की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। उनके बारे में दी गई जानकारी के मुताबिक, उन्होंने कम उम्र में ही कोडिंग शुरू कर दी थी।
कोविड के दौरान उन्होंने अस्पतालों में बेड की उपलब्धता से जुड़ा एक प्लेटफॉर्म बनाया था, जिसका इस्तेमाल हजारों लोगों ने किया। बाद में हैकाथॉन और प्रोडक्ट बिल्डिंग का उनका सिलसिला जारी रहा। दोनों की काम करने की शैली भी अलग बताई जाती है।
वेदांत का जवाब अक्सर होता है- “मैं बना दूंगा।” वहीं सात्विक किसी समस्या को तुरंत स्वीकार करने के बजाय बार-बार ‘क्यों’ पूछकर उसकी जड़ तक पहुंचने पर जोर देते हैं। सात्विक कपूर ने जागरण बिजनेस से खास बातचीत में बताया कि उन्हें अमेजन ने ऑफर दिया था। लेकिन उन्होंने उसे ठुकरा दिया।
जबकि वेदांत सिंह ने करीब 30 लाख डॉलर सालाना रेवेन्यू वाले एक स्टार्टअप की CTO भूमिका ठुकराई। इसके बाद दोनों ने Morsa पर पूरा फोकस किया। कंपनी ने 2026 में मौजूदा Morsa प्रोडक्ट पर काम शुरू किया।
इसके बाद शुरुआती ग्राहकों तक पहुंचने के लिए दोनों ने सैकड़ों बातचीत कीं और कंपनियों के दफ्तरों में जाकर उनकी समस्याएं समझीं। जैक्सन स्क्वायर वेंचर्स ने Morsa को अपनी Launchpad कंपनियों में शामिल किया है और उसे ‘Agentic Manufacturing’ कंपनी के तौर पर सूचीबद्ध किया है। निवेशक के मुताबिक Morsa फैक्ट्री में क्या हो रहा है, उसे समझकर अगला कदम तय करने और लोगों, मशीनों और वेंडर्स के बीच उस काम को आगे बढ़ाने पर काम करती है।
भारत जैसे देश में, जहां मैन्युफैक्चरिंग में बड़ी संख्या में MSME और सप्लायर नेटवर्क काम करते हैं, ऐसा मॉडल खास दिलचस्प हो सकता है। लेकिन अभी Morsa शुरुआती चरण की कंपनी है और उपलब्ध प्रमुख प्रदर्शन आंकड़े सीमित ग्राहक डेटा पर आधारित हैं। इसलिए इसके असर को बड़े स्तर पर साबित होने में अभी और समय और डेटा लगेगा।
फिलहाल कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा यही है- दो युवा भारतीय मूल के इंजीनियरों ने फैक्ट्री की एक पुरानी समस्या को देखा और उसका जवाब एक ऐसे एआई सिस्टम में तलाशा, जो सिर्फ यह न बताए कि क्या गलत हुआ, बल्कि यह भी पूछे कि अब इसे ठीक कौन करेगा?
