राष्ट्रवाणी: गोदरेज ने 1918 में स्पैनिश फ्लू के दौरान दुनिया का पहला वनस्पति तेल आधारित साबुन लॉन्च किया, जो आत्मनिर्भरता और …और पढ़ें भारत में बना पहला बिना चर्बी वाला साबुन (एआई फोटो) 1918 में गोदरेज ने पहला वनस्पति तेल साबुन लॉन्च किया यह साबुन पशु-चर्बी रहित, स्वदेशी सोच का प्रतीक था आर्देशिर गोदरेज ने आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन किया बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली।
आज साबुन रोजमर्रा की जिंदगी की ऐसी चीज है, जिसके पीछे छिपी कहानी शायद ही कोई सोचता हो। हालांकि करीब 100 साल पहले भारत में साबुन बनाना सिर्फ कारोबार नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और समाज से जुड़ा अहम प्रयोग था।उसी दौर में आर्देशिर गोदरेज ने ऐसा साबुन बनाने का फैसला किया, जिसमें पशु-चर्बी की जगह वनस्पति तेल का इस्तेमाल हो।
1918 में स्पैनिश फ्लू महामारी के बीच उन्होंने कमर्शियल तौर पर दुनिया का पहला vegetable-oil based soap लॉन्च किया। यह प्रयोग आगे चलकर गोदरेज के सबसे पुराने और चर्चित उपभोक्ता कारोबार की नींव बना। ये साबुन आज 12 अक्टूबर के ही दिन लॉन्च किया गया था।
आर्देशिर गोदरेज की कारोबारी यात्रा साबुन से शुरू नहीं हुई थी। 1897 में उन्होंने मुंबई के लालबाग में ताले बनाने का काम शुरू किया। उस समय भारतीय बाजार में ब्रिटिश और विदेशी कंपनियों का काफी दबदबा था।
आर्देशिर की सोच थी कि भारत में ऐसी चीजें बनाई जाएं जो क्वालिटी में विदेशी उत्पादों का मुकाबला कर सकें।ताले और बाद में अलमारी बनाने के कारोबार में सफलता मिलने के बाद उनका ध्यान रोजमर्रा की उपभोक्ता वस्तुओं की तरफ गया। यह दौर भारत में स्वदेशी और आर्थिक आत्मनिर्भरता की भावना के उभार का भी था।
उस समय विदेशों से आने वाले कई साबुनों में पशु-चर्बी का इस्तेमाल होता था। भारत जैसे देश में यह एक संवेदनशील मुद्दा था, क्योंकि अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के कारण ऐसे साबुन को हर परिवार सहजता से स्वीकार नहीं करता था।आर्देशिर ने इसी समस्या को कारोबारी मौके की तरह देखा। उनका सवाल सीधा था कि जब साबुन वनस्पति तेल से बनाया जा सकता है तो उसमें पशु-चर्बी का इस्तेमाल क्यों किया जाए?
इसके बाद उन्होंने वनस्पति तेल आधारित साबुन तैयार करने के प्रयोग शुरू किए। कई प्रयोगों के बाद आर्देशिर इस नए फॉर्मूले को व्यावसायिक स्तर पर लाने में सफल हुए। साल 1918 में दुनिया स्पैनिश फ्लू की महामारी से जूझ रही थी।
उसी दौरान गोदरेज ने वनस्पति तेल से बना साबुन बाजार में उतारा। गोदरेज के आधिकारिक इतिहास के मुताबिक इसे दुनिया का पहला व्यावसायिक रूप से बना वनस्पति-तेल का साबुन माना जाता है।दिलचस्प बात यह है कि आर्देशिर ने शुरुआत में इसका नाम Godrej No 2 रखा था, क्योंकि उन्हें लगता था कि आगे इससे भी बेहतर उत्पाद बनाया जा सकता है।
इस साबुन की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उसका फॉर्मूला नहीं था, बल्कि उसका भारतीय उपभोक्ता को ध्यान में रखकर बनाया जाना था। पशु-चर्बी से दूरी ने इसे उन ग्राहकों के लिए आकर्षक बनाया जो ऐसे उत्पाद की तलाश में थे जिसे वे सांस्कृतिक रूप से सहज महसूस करें।उस समय विदेशी कंपनियों से मुकाबला आसान नहीं था, लेकिन गोदरेज ने धीरे-धीरे अपना भरोसा बनाया।
यही वह रणनीति थी जिसने एक छोटे प्रयोग को आगे चलकर बड़े उपभोक्ता कारोबार में बदलने की जमीन तैयार की। गोदरेज साबुन की कहानी केवल बाजार तक सीमित नहीं रही। कंपनी की स्वदेशी सोच और स्वतंत्रता आंदोलन के साथ उसका जुड़ाव भी मजबूत हुआ।
1921 में आर्देशिर ने अपने मुनाफे का एक हिस्सा स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े प्रयासों में दिया, जिसमें तिलक स्वराज फंड भी शामिल था।आगे चलकर गोदरेज साबुन को रवींद्रनाथ टैगोर, एनी बेसेंट और सी. राजगोपालाचारी जैसे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े प्रमुख व्यक्तित्वों का समर्थन मिला। इससे ब्रांड को उस दौर में एक अलग पहचान हासिल हुई।
आर्देशिर का 1918 का प्रयोग आगे चलकर एक बड़े कंज्यूमर ब्रांड की नींव बना। शुरुआती उत्पाद Godrej No 2 था, लेकिन बाद में Godrej No 1 ने अपनी अलग पहचान बनाई और आज भी यह भारत के पुराने और बड़े कंज्यूमर ब्रांड्स में गिना जाता है।आर्देशिर का निधन 1936 में हुआ, लेकिन उनके बनाए कारोबार को उनके भाई पिरोजशा ने आगे बढ़ाया।
इस तरह 1918 में शुरू हुआ वनस्पति तेल वाला साबुन सिर्फ एक नया उत्पाद नहीं रहा, बल्कि गोदरेज की उस कारोबारी सोच का प्रतीक बन गया जिसमें भारतीय जरूरत, क्वालिटी, स्वदेशी आत्मनिर्भरता और व्यावसायिक अवसर – चारों को एक साथ देखा गया।
