राष्ट्रवाणी: भारत का पहला पेट्रोल पंप 1928 में मुंबई के ह्यूजेस रोड पर बर्मा शेल द्वारा स्थापित किया गया था, जिसने …और पढ़ें बर्मा शेल ने ह्यूजेस रोड पर इसकी शुरुआत की थी 1976 में इसका राष्ट्रीयकरण होकर BPCL बना बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। आज देश के लगभग हर शहर और कस्बे में पेट्रोल पंप आसानी से मिल जाते हैं।
पेट्रोल-डीजल की बिक्री अब भारत के विशाल एनर्जी नेटवर्क का हिस्सा है और देश में पेट्रोल पंपों की संख्या एक लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है। लेकिन करीब एक सदी पहले भारत में पेट्रोल पंप की कल्पना भी नई थी। सवाल है कि देश में पहली बार गाड़ियों में पेट्रोल भरने की सुविधा कहां शुरू हुई और इसके पीछे कौन सी कंपनी थी?
इतिहास पर नजर डालें तो इसकी शुरुआत 1928 में तत्कालीन बॉम्बे यानी आज की मुंबई से हुई थी। यही स्टेशन आगे चलकर भारत के पेट्रोलियम कारोबार के विकास की शुरुआती कड़ी बना। भारत में पहला पेट्रोल स्टेशन 1928 में मुंबई में लगाया गया।
उस दौर में शहर को बॉम्बे के नाम से जाना जाता था। इसे बर्मा शेल ने शुरू किया था। यह स्टेशन उस समय के ह्यूजेस रोड पर बनाया गया था, जिसे आज एनी बेसेंट रोड के नाम से जाना जाता है और यह इलाका वर्ली के आसपास आता है।शुरुआती दौर में यहां आज की तरह आधुनिक मशीनें या डिजिटल मीटर नहीं थे।
स्टेशन पर पेट्रोल देने के लिए सिर्फ दो मैनुअल डिस्पेंसर लगाए गए थे। ईंधन को स्टोर करने की क्षमता भी सीमित थी और करीब 200 से 300 गैलन यानी लगभग 900 से 1,200 लीटर पेट्रोल रखा जा सकता था। जिस कंपनी ने यह स्टेशन शुरू किया था, उसका नाम बर्मा शेल था।
यह कंपनी Burmah Oil Company और Shell Petroleum Company के बीच बने जॉइंट वेंचर के रूप में भारत में काम कर रही थी। 1928 से लेकर 1976 तक कंपनी ने भारत में पेट्रोलियम उत्पादों के डिस्ट्रिब्यूशन का बड़ा नेटवर्क तैयार किया।उस समय केवल पेट्रोल ही नहीं, बल्कि मिट्टी का तेल और लुब्रिकेंट्स भी अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाए जाते थे।
1976 में भारत सरकार ने कंपनी का राष्ट्रीयकरण किया और इसके बाद Bharat Petroleum Corporation Limited यानी BPCLअस्तित्व में आई। आज BPCL देश की प्रमुख ऑयल मार्केटिंग कंपनियों में शामिल है और हजारों पेट्रोल पंपों ऑपरेट करती है। आज भारत अपनी बड़ी रिफाइनरी क्षमता के लिए जाना जाता है, लेकिन 1928 में हालात बिल्कुल अलग थे।
देश में उस समय ऐसी रिफाइनरी व्यवस्था मौजूद नहीं थी, जो घरेलू स्तर पर बड़े पैमाने पर पेट्रोल तैयार कर सके। इसलिए ईंधन को समुद्री मार्ग से दूसरे देशों से मंगाया जाता था।बर्मा यानी आज के म्यांमार, ईरान और पश्चिम एशिया से आने वाला पेट्रोल पहले जहाजों के जरिये मुंबई पहुंचता था। वहां से इसे आगे ले जाने के लिए ट्रकों और कई जगह बैलगाड़ियों तक का सहारा लिया जाता था।
पेट्रोल को करीब 40 गैलन क्षमता वाले ड्रमों में भरकर अलग-अलग जगहों तक पहुंचाया जाता था। आज पेट्रोल पंप पर कुछ सेकेंड में गाड़ी की टंकी भर जाती है, लेकिन उस समय ईंधन भरने की प्रोसेस काफी अलग थी। पेट्रोल निकालने और वाहन में डालने के लिए हैंड-पंप का इस्तेमाल किया जाता था।
यानी आज जैसी ऑटोमेटिक फ्यूल डिस्पेंसिंग मशीनें उस दौर में मौजूद नहीं थीं।सप्लाई चेन भी काफी मुश्किल थी। बारिश और नमी के कारण धातु के ड्रमों में जंग लगने का खतरा बना रहता था और कई बार इसी वजह से ईंधन के रिसाव जैसी परेशानियां पैदा होती थीं। सीमित वाहन संख्या और अनिश्चित सप्लाई के बीच कंपनी के लिए शुरुआती कारोबार को लेकर जोखिम भी कम नहीं था।
उस दौर की कीमतों को आज के नजरिये से देखें तो पेट्रोल बेहद सस्ता लगता है। शुरुआती वर्षों में इसकी कीमत लगभग 1 से 2 आना प्रति लीटर के बीच बताई जाती है। उस समय एक रुपये में 16 लीटर से ज्यादा पेट्रोल खरीदा जा सकता था।लेकिन केवल कीमत देखकर उस दौर के पेट्रोल को सस्ता मानना सही नहीं होगा।
आम भारतीय की दैनिक आय एक रुपये से भी कम हुआ करती थी। ऐसे में वाहन रखना और पेट्रोल खरीदना सामान्य परिवारों के लिए आसान नहीं था। इसलिए शुरुआती ग्राहक मुख्य रूप से आर्थिक रूप से संपन्न तबका था।
मुंबई में शुरू हुए इस पहले पेट्रोल स्टेशन के ग्राहक भी उस समय के समाज के संपन्न वर्ग से आते थे। पारसी और गुजराती कारोबारी परिवार, ब्रिटिश अधिकारी और सरकारी अफसर यहां पेट्रोल भरवाने पहुंचते थे। मुंबई आने वाले राजघरानों के लोग भी इसका इस्तेमाल करते थे।इसके अलावा शहर की शुरुआती टैक्सी सेवा से जुड़े ड्राइवर भी पेट्रोल स्टेशन के नियमित ग्राहकों में शामिल हो गए।
शुरुआत में जिस कारोबार का भविष्य अनिश्चित दिखाई देता था, धीरे-धीरे वही भारत के बढ़ते मोटर वाहन बाजार के साथ फैलता गया।मुंबई का वह शुरुआती स्टेशन इस बात का प्रतीक बन गया कि भारत में ऑटोमोबाइल और पेट्रोलियम कारोबार किस तरह एक-दूसरे के साथ आगे बढ़ने वाले थे।
