राष्ट्रवाणी: प्रतिनधि, रायपुर। प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी चिकित्सा संस्थान डॉ. भीमराव आंबेडकर स्मृति चिकित्सालय (आंबेडकर अस्पताल) में मरीजों को इलाज से पहले ही बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। रोजाना दो से ढाई हजार मरीजों की ओपीडी वाले इस अस्पताल में व्हीलचेयर और स्ट्रेचर की भारी कमी है। गंभीर मरीज, बुजुर्ग और दिव्यांगों को कई बार परिजनों के सहारे विभागों तक पहुंचना पड़ता है। स्थिति यह है कि पिछले सात वर्षों में अस्पताल में केवल 24 नए स्ट्रेचर और 52 व्हीलचेयर ही बढ़ पाए हैं, जिनमें से अधिकांश सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से उपलब्ध हुए। मरीजों की बढ़ती संख्या के मुकाबले संसाधनों का विस्तार न होने से अस्पताल की व्यवस्थाओं पर सवाल उठ रहे हैं। आंबेडकर अस्पताल में 18 विभाग और आईसीयू सहित कुल 35 वार्ड संचालित हैं। प्रतिदिन 2,000 से 2,500 मरीज ओपीडी में पहुंचते हैं, लेकिन पूरे अस्पताल में केवल 91 व्हीलचेयर और 78 स्ट्रेचर उपलब्ध हैं। इनमें से कुछ मुख्य प्रवेश द्वार पर तैनात रहते हैं, जबकि शेष विभिन्न वार्डों और विभागों में उपयोग किए जाते हैं। मरीजों की संख्या बढ़ने पर संसाधनों की कमी साफ दिखाई देने लगती है और जरूरतमंदों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है। अस्पताल में वर्षों पुराने व्हीलचेयर और स्ट्रेचर अब जर्जर हो चुके हैं। कई व्हीलचेयर के पहिए जाम हैं तो कई स्ट्रेचर उपयोग के लायक नहीं बचे। अस्पताल परिसर के पिछले हिस्से में दर्जनों खराब उपकरण कबाड़ में पड़े हैं, जिनकी मरम्मत भी संभव नहीं है। लंबे समय से नई खरीदी नहीं होने के कारण समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। बालोद निवासी टिकेश्वर निषाद को गंभीर कमजोरी के कारण जांच विभाग तक ले जाने के लिए काफी देर तक व्हीलचेयर नहीं मिली। आखिरकार परिजनों ने उन्हें सहारा देकर विभाग तक पहुंचाया। वहीं दुर्घटना में घायल लखन देवांगन को भी अस्पताल पहुंचने के बाद स्ट्रेचर के लिए इंतजार करना पड़ा। दूसरे वार्ड से स्ट्रेचर आने के बाद ही उनका उपचार शुरू हो सका, जिससे इलाज में देरी हुई। अस्पताल अधीक्षक डॉ. संतोष सोनकर ने कहा कि मरीजों को किसी प्रकार की असुविधा न हो, इसके लिए अतिरिक्त व्हीलचेयर और स्ट्रेचर उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। उन्होंने बताया कि वर्तमान आवश्यकता को देखते हुए 50 नए व्हीलचेयर और 50 नए स्ट्रेचर खरीदने की तैयारी की जा रही है। नियमानुसार प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन्हें अस्पताल में उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे मरीजों को राहत मिलने की उम्मीद है।
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