राष्ट्रवाणी: स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने अपने जीवन का एकमात्र गढ़वाली गीत 1990 की फिल्म ‘रैबार’ के लिए गाया था, जिसकी धुन आज भी पहाड़ों में गूंजती है। लता मंगेशकर ने 36 साल पहले गाया था गढ़वाली गीत गायिका ने नहीं ली थी गाने के लिए कोई फीस एंटरटेनमेंट डेस्क,नई दिल्ली।
लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) के बॉलीवुड गाने तो आपने बहुत सुने होंगे। स्वर कोकिला कही जाने वाली इस सिंगर ने अलग-अलग भाषाओं में करीब 30 हजार से अधिक गाने गाए हैं। आज हम आपको लता दीदी के एक ऐसे ही गाने के बारे में बताने वाले हैं जोकि हिंदी और पंजाबी से थोड़ा अलग हटकर बंगाली भाषा में है।
हम उस गीत की बात कर रहे हैं जिसे लता मंगेशकर ने गढ़वाली भाषा में गाया है। ये उनका गढ़वाली भाषा में गाया पहला और आखिरी गीत था लेकिन इसकी गूंज पहाड़ों में आज भी कायम है। यह गाना प्रसिद्ध गढ़वाली फिल्म ‘रैबार’ का हिस्सा था जिसे देवी प्रसाद सेमवाल ने लिखा और कुंवर सिंह बावला ने कंपोज किया था।
फिल्म साल 1990 में रिलीज हुई थी। लता मंगेशकर जी ने अपने पूरे जीवन में केवल एक ही गढ़वाली गाना गाया और वह इसी फिल्म के लिए था। बता दें कि गढ़वाली भाषा में ‘रैबर’ शब्द का उद्देश्य संदेश यानी मैसेज होता है।
स्क्रीन पर इस खूबसूरत और रुमानी गीत को उत्तराखंड के मशहूर कलाकारों बीना रावत और शिवेंद्र रावत पर फिल्माया गया था, जिनकी केमिस्ट्री को लोगों ने खूब पसंद किया। गाने के बोल- ‘मन भरमैगे मेरी सुधबुद ख्वेगे सुणी तेरी बांसुरी सुर’ ये गाना खास तौर पर अपने प्रीतम की बांसुरी की धुन की तारीफ में प्रेमिका द्वारा गाया सुंदर गीत है।
यह पहाड़ों की सादगी और प्रकृति से जुड़ाव को बखूबी दर्शाता है। बताया जाता है कि उस समय इस गीत के लिए लता मंगेशकर ने चार घंटे का समय निकाला और एक एक शब्द का अर्थ समझ कर गाया। कई जगह इस तरह की भी खबरें है कि लता जी ने इस खूबसूरत गीत के लिए कोई फीस नहीं ली थी।
जी हां, लता जी ने उत्तराखंड की लोक संस्कृति के प्रति अपने प्रेम के कारण फीस लेने से साफ इनकार कर दिया था।

