राष्ट्रवाणी: क्लाइमेट ट्रैकर के मुताबिक अक्टूबर से मार्च के बीच भारत में गर्मी से जुड़ी करीब 55,000 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं. नाइजीरिया में करीब 56,000 मौतों का अनुमान है. दक्षिण-पूर्व एशिया में भी खतरा बना हुआ है. इंडोनेशिया में करीब 29,000 और ब्राजील में 19,000 मौतों का अनुमान लगाया गया है. ये आंकड़े ट्रैकर के अनुमान हैं. इन्हें निश्चित मौतों की संख्या नहीं माना जाना चाहिए. अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है. इसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से की सतह का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है. इससे हवाओं और वायुमंडलीय दबाव में बदलाव आता है. बारिश का पैटर्न भी बदल सकता है. दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इसका असर अलग होता है. कहीं सूखा पड़ सकता है तो कहीं भारी बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ता है. अल-नीनो आमतौर पर हर दो से सात साल में विकसित होता है और करीब नौ से 12 महीने तक बना रह सकता है. इसके विपरीत ला-नीना की स्थिति में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ठंडा रहता है. क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के सह-संस्थापक माइकल ग्रीनस्टोन ने कहा, ‘भीषण गर्मी के जानलेवा असर का पहले से अनुमान लगा पाना एक बड़ी प्रगति है. इसका मतलब है कि हम उन जगहों की पहचान कर सकते हैं जहां लोगों को सबसे ज्यादा खतरा है और नीति बनाने वालों को जान बचाने के लिए पहले से कदम उठाने का मौका दे सकते हैं. यह ट्रैकर उस सुपर अल-नीनो के बारे में ऐसी जानकारी देता है जिसका सामना हम अभी कर रहे हैं.’ विश्व मौसम संगठन के मुताबिक दिसंबर में संभावित चरम पर पहुंचने से पहले अल-नीनो और मजबूत हो सकता है. संगठन ने कहा, ‘अल-नीनो दिसंबर में अपने अनुमानित चरम पर पहुंचने से पहले और मजबूत होता रहेगा. इससे दुनिया के बड़े हिस्से में औसत से ज्यादा तापमान रहने और बारिश के पैटर्न में बदलाव होने की संभावना है. अलग-अलग क्षेत्रों में सूखे और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है.’ WMO ने यह भी कहा कि अल-नीनो का असर 2027 की शुरुआत तक जारी रह सकता है. QR स्कैन करें, डाउनलोड करें News18 ऐप या वेबसाइट पर जारी रखने के लिए यहां क्लिक करें
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