मुंबई. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के डिप्टी गवर्नर टी. रबि शंकर ने बृहस्पतिवार को कहा कि ‘स्टेबलकॉइन’ देश की नीतिगत संप्रभुता के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकते हैं, लिहाजा भारत ऐसे संपत्ति-सर्मिथत डिजिटल उपकरणों को अपनाने से परहेज करेगा. स्टेबलकॉइन एक तरह की डिजिटल मुद्रा होता है जिसकी कीमत किसी स्थिर परिसंपत्ति- जैसे अमेरिकी डॉलर, सोने या सरकारी बॉन्ड से जुड़ी होती है.
आरबीआई के डिप्टी गवर्नर ने यहां ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में कहा, “हमारे विचार स्पष्ट हैं कि स्टेबलकॉइन ऐसा कोई उद्देश्य पूरा नहीं करते जिसे केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (सीबीडीसी) बेहतर ढंग से न पूरा कर पाए. इनसे कई नीतिगत जटिलताएं और जोखिम पैदा होते हैं, जिन्हें टालना ही बेहतर होगा.” उन्होंने स्वीकार किया कि क्रिप्टोकरेंसी के उलट स्टेबलकॉइन को डॉलर या सोने जैसी परिसंपत्ति से समर्थन मिला होता है, जिससे उनकी कीमत अपेक्षाकृत स्थिर रहती है.
इसी के साथ उन्होंने कहा, “ऐसे टोकन किसी देश की मुद्रा की जगह ले सकते हैं और उसकी मौद्रिक नीति पर नियंत्रण को कमजोर कर सकते हैं.” उन्होंने कहा, ”… भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए स्टेबलकॉइन का जोखिम यह है कि यह आपकी मुद्रा और आपकी नीतिगत संप्रभुता को प्रतिस्थापित करने का एक बड़ा जोखिम उठाता है.” भारत ने सीबीडीसी यानी ई-रुपया को दो वर्ष पहले पायलट परियोजना के रूप में शुरू किया था. अब तक इससे 10 करोड़ से अधिक लेनदेन हो चुके हैं.
शंकर ने बताया कि सीबीडीसी का मुख्य लाभ यह है कि यह सीमापार भुगतान को सस्ता एवं सहज बनाता है और “प्रोग्रामेबल मनी” के रूप में इसके उपयोग को नियंत्रित किया जा सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि रुपया अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में धीरे-धीरे मजबूत भूमिका निभाएगा, लेकिन भारत फिलहाल पूंजी खाते की पूर्ण रूप से स्वतंत्रता की दिशा में नहीं बढ़ेगा.

