राष्ट्रवाणी: नवरात्र में पहनी जाने वाली गुजराती चनिया चोली का इतिहास वैदिक काल के अंतरीय और उत्तरीय से जुड़ा है। वैदिक काल से जुड़ा है गुजरात की चनिया चोली का इतिहास (Image Source: एआई Generated) जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली।
नवरात्र आते ही लोग गरबा करने के उत्साह से भर जाते हैं; रंग-बिरंगी चनिया चोली, हाथों में डांडिया और गुजराती गाने। फिर जब महिलाएं इस पारंपरिक वेशभूषा में थिरकती हैं, तो वो चनिया का लहराता हुआ घेर गरबा की रौनक ही बढ़ा देता है। पर क्या आप इस गुजराती परिधान का इतिहास जानते हैं?
आइए आपको बताते हैं आखिर कैसे यह परिधान गुजरात की खास पहचान बन गया। गुजरात के इस पारंपरिक पहनावे के इतिहास पर नजर डालें, तो इसकी जड़ें हमें वैदिक काल में देखने को मिलती है। उस समय महिलाएं अंतरीय और उत्तरीय जैसे कॉस्ट्यूम पहना करती थीं।
इसमें उत्तरीय उनके शरीर के ऊपरी हिस्से को ढकने वाला वस्त्र था, जबकि अंतरीय उनके शरीर के निचले के लिए होता था। अब शरीर के ऊपरी हिस्से के कपड़े यानी उत्तरीय स्थानपट्ट या कंचुकी में बदल गया, जबकि निचले हिस्से को चनिया या घाघरा कहा गया। राजस्थान में इस हिस्से को पारंपरिक नाम कंचली, तो गुजरात और सिंध में कंजरी कहा जाने लगा।
हां, वही कंजरी जिसे हम आज चोली कहते हैं। इस तरह यह गुजराती परिधान आज से करीब 2000 साल से भी ज्यादा पुराना है। कहा जाता है कि कुषाण और शक जैसी शक्तिशाली जनजातियों का जब दौर शुरू हुआ, तो लोग सिले हुए कपड़े पहनने लगे थे, पर गुप्त काल में चनिया चोली को पहचान मिलनी शुरू हुई।
इतिहास में यह बात दर्ज है कि उस समय यह परिधान राजपरिवार के साथ ही नर्तकियों की सुंदरता का प्रतीक बन चुका था। जहां एक तरफ राजघराने की महिलाएं कढ़ाई वाली चोली और घेरदार चनिया पहना करती थीं, वहीं दूसरी तरफ आम महिलाओं में सूती कपड़े से बनी चनिया चोली पहने जाने का चलन था। आपको जानकर हैरानी होगी कि उस दौर में भी रेडिकल सोच थी, क्योंकि महिलाओं के कपड़े ज्यादा ढके होने की जगह खुले होते थे।
फिर समय के साथ ही महिलाओं के पहनावे में बड़े स्तर पर बदलाव देखने को मिला। कहा तो यह भी जाता है कि मुगल काल में महिलाओं के कपड़े ज्यादा ढके या बंधे पहने जाने लगे थे, जिसका पश्चिमी भारत में पारंपरिक रूप लहंगा चोली था।

