राष्ट्रवाणी: बचपन की पसंदीदा कॉटन कैंडी का सबसे पहला नाम तो ‘फेयरी फ्लॉस’ था, पर बच्चे इसे ‘बुढ़िया के बाल’ ही कहते हैं। अमेरिका में बनी थी पहली कॉटन कैंडी (Image Source: एआई Generated) जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बचपन से हम जिस कॉटन कैंडी को खाते आ रहे हैं, उसकी कहानी आज से 120 साल पुरानी है।
फिर भी देखिए यह अभी तक बच्चों की उतनी ही पसंदीदा बनी हुई है। हां, हम उसी कैंडी की बात कर रहे हैं, जिसे आम बोलचाल में बच्चे ‘बुढ़िया के बाल’ कहते हैं। आइए आपको गली-मोहल्लों में बिकने वाली इस पतली सी लकड़ी पर गोल-गोल लपेटी हुई कैंडी का दिलचस्प इतिहास बताते हैं।
कॉटन कैंडी जिसे हम भारतीय बुढ़िया के बाल कहते हैं, सबसे पहले अमेरिका में बनी थी। अमेरिका में विलियम्स जेम्स मॉरिसन नाम के एक डेन्टिस्ट ने इस कैंडी का आविष्कार किया था। दरअसल, उन्हें नई-नई चीजें बनाने का बड़ा शौक था।
कहते हैं कि साल 1897 में जेम्स मॉरिसन ने जॉन सी व्हाटर्न नामक एक हलवाई के साथ मिलकर एक मशीन इन्वेन्ट की, इस अनोखी मशीन में गरम चीनी को घुमाकर कैंडी तैयार होती थी। डेन्टिस्ट ने मशीन को ‘फेयरी फ्लॉस’ नाम से पेटेंट करवाया था। इसका मतलब होता है ‘परियों का सूती धागा’।
उन्होंने इस मशीन को बनाने के 7 साल बाद एक मेले में रखा और 25 पैसे प्रति बॉक्स के हिसाब से कैंडी को बेचना शुरू किया। इतिहास में यह बात दर्ज है कि 7 महीनों तक चलने वाले इस मेले में जेम्स ने 68,000 से ज्यादा डिब्बे बेचे, जिससे उन्होंने $17,000 यानी करीब 5 लाख डॉलर की कमाई की थी। इस कैंडी को पहली बार जेम्स नामक डेन्टिस्ट ने फेयरी फ्लॉस नाम से बेचा, फिर दूसरी बार डॉ. जोसेफ लास्को ने साल 1920 में ऐसी ही मिलती-जुलती एक मशीन बनाई और कैंडी को एक सरल नाम दिया ‘कॉटन कैंडी’।
डॉ. जोसेफ की मशीन की बनी कैंडी बिल्कुल रुई जैसी थी, जिस वजह से लोगों ने भी इस नाम को अपना लिया। शुरू-शुरू में ये कैंडी सफेद रंग में बिकती थी, फिर कुछ सालों बाद इसकी पहचान हल्के गुलाबी और नीले रंग से जुड़ गई। आज कॉटन कैंडी का इतिहास भले ही 120 साल पुराना हो चुका है, पर छोटे बच्चों में इसे खाने का क्रेज उतना ही नया और उत्साह से भरा हुआ है।

