राष्ट्रवाणी: आखिर पंचायत चुनावों में मतपत्रों का इस्तेमाल क्यों होता है? इसकी एक बड़ी वजह खर्च और व्यवस्था से जुड़ी है. कई राज्यों में ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद के चुनाव एक ही समय के आसपास होते हैं. अलग-अलग पदों के लिए बड़ी संख्या में मतदान केंद्रों पर मशीनें उपलब्ध कराना मुश्किल हो सकता है. ऐसे में मतपत्रों का इस्तेमाल आसान विकल्प बन जाता है. नगर निगम और दूसरी शहरी स्थानीय निकायों के चुनावों में भी पूरे देश में एक जैसी व्यवस्था नहीं है. इन चुनावों की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोगों के पास होती है. आयोग संबंधित राज्य के कानूनों और नियमों के तहत ईवीएम या बैलट पेपर से मतदान कराने का फैसला कर सकता है. दिल्ली नगर निगम के चुनाव ईवीएम से होते हैं. वहीं, पंजाब ने 2026 में नगर निकाय चुनावों के लिए बैलट पेपर का रास्ता चुना. पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी स्पष्ट किया कि पंजाब नगरपालिका निर्वाचन नियम, 1994 में दोनों तरीकों की अनुमति है. यानी जहां नियम इजाजत देते हैं, वहां राज्य निर्वाचन आयोग तय कर सकता है कि मतदान मशीन से होगा या मतपत्र से. विश्वविद्यालयों के छात्रसंघ चुनावों में भी बैलट पेपर और ईवीएम, दोनों का इस्तेमाल होता है. दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनाव ईवीएम से कराए जाते हैं, जबकि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनावों में बैलट पेपर का इस्तेमाल होता है. देश के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव आम जनता सीधे मतदान करके नहीं करती. राष्ट्रपति के चुनाव में निर्वाचित सांसदों और राज्यों तथा कुछ केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य हिस्सा लेते हैं. उपराष्ट्रपति के चुनाव में संसद के दोनों सदनों के सदस्य मतदान करते हैं. इन दोनों चुनावों में मतपत्रों का इस्तेमाल होता है. मतदाता उम्मीदवारों के सामने अपनी प्राथमिकता दर्ज करते हैं. राष्ट्रपति के चुनाव में वोटों का मूल्य भी निर्धारित होता है, जबकि उपराष्ट्रपति के चुनाव में संसद के सदस्यों के वोटों की गणना निर्धारित प्रक्रिया के तहत होती है. इन चुनावों में मतपत्र का इस्तेमाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां केवल किसी एक उम्मीदवार के सामने बटन दबाकर वोट देने की प्रक्रिया नहीं होती. मतदाताओं को उम्मीदवारों के लिए अपनी प्राथमिकताएं दर्ज करनी होती हैं. राज्यसभा के चुनाव भी बैलट पेपर से होते हैं. इन चुनावों में राज्यों के विधायक मतदान करते हैं. यहां सिंगल ट्रांसफरेबल वोट (STV) का इस्तेमाल किया जाता है. इसके तहत विधायक उम्मीदवारों के सामने पहली, दूसरी, तीसरी और आगे की प्राथमिकताएं दर्ज कर सकते हैं. राज्यसभा चुनाव में मतदान खुला मतपत्र यानी ओपन बैलट व्यवस्था के तहत होता है. इसका मतलब है कि यह राष्ट्रपति चुनाव की तरह पूरी तरह गोपनीय मतदान की व्यवस्था नहीं है. राजनीतिक दलों के अधिकृत एजेंटों को निर्धारित नियमों के तहत मतपत्र दिखाने की व्यवस्था होती है. हाल में बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में विधान परिषद की सीटों के लिए हुए चुनावों में भी बैलट पेपर का इस्तेमाल किया गया. इसकी वजह चुनाव की निर्धारित प्रणाली है. संविधान के अनुच्छेद 171 के तहत विधान परिषदों की संरचना और सदस्यों के निर्वाचन की व्यवस्था तय की गई है. परिषद के निर्वाचित सदस्यों की विभिन्न श्रेणियों के चुनाव में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत सिंगल ट्रांसफरेबल वोट यानी एसटीवी का इस्तेमाल होता है. इसमें मतदाता उम्मीदवारों के लिए अपनी प्राथमिकता दर्ज करते हैं. इसी प्रक्रिया के कारण इन चुनावों में मतपत्र का इस्तेमाल होता है. बैलट पेपर और ईवीएम को लेकर बहस केवल चुनावी नतीजों तक सीमित नहीं है. मतपत्रों से मतदान कराने वालों का तर्क है कि मतदाता कागज पर अपनी पसंद दर्ज करता है और मतगणना के दौरान मतपत्रों की जांच की जा सकती है. दूसरी ओर ईवीएम के समर्थक तेज मतगणना, बड़ी संख्या में मतपत्रों की छपाई से बचाव और मतगणना की प्रक्रिया को आसान बनाने जैसे फायदे गिनाते हैं. दोनों तरीकों में अपनी-अपनी चुनौतियां हैं. बैलट पेपर में मतपत्रों की छपाई, सुरक्षित रखरखाव, परिवहन और गिनती की बड़ी व्यवस्था करनी पड़ती है. वहीं, ईवीएम की विश्वसनीयता, चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और मशीनों की जांच को लेकर राजनीतिक दल समय-समय पर सवाल उठाते रहे हैं. QR स्कैन करें, डाउनलोड करें News18 ऐप या वेबसाइट पर जारी रखने के लिए यहां क्लिक करें
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