राष्ट्रवाणी: राजस्थान अपनी समृद्ध संस्कृति और विविध बोलियों के लिए जाना जाता है, जो इसकी पहचान का अहम हिस्सा हैं। राजस्थान में बोली जाती हैं ये बोलियां (एआई Generated Image) जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। राजस्थान की अपनी खास संस्कृति है, जिसमें वहां की लोक-भाषाओं और बोलियों का अहम योगदान है।
भारत के लिए एक कहावत कही जाती है कि कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी, यानी हर चार कोस पर यहां भाषा या बोली बदल जाती है। राजस्थान में भी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग बोलियां बोली जाती हैं, जो उस जगह की लोक संस्कृति का हिस्सा हैं। आइए जानें राजस्थान में कौन-कौन सी बोलियां बोली जाती हैं।
मारवाड़ी राजस्थान की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली बोली है, जिसे कई क्षेत्रों में बोला जाता है। जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, नागौर, और पाली में मारवाड़ी ही बोली जाती है। पश्चिमी राजस्थान में बोली जाने वाली इस बोली का इतिहास काफी पुराना है।
मारवाड़ी में गाए गए कई गाने आपने सुने होंगे, जैसे- हरियाला बनड़ा ओ थारी बोली प्यारी लागे। पूर्वी राजस्थान और यहां के मध्य भाग में ढूंढ़ाड़ी बोली का इस्तेमाल ज्यादा होता है। जयपुर, दौसा, टोंक और अजमेर के कुछ हिस्सों में ये बोली बोली जाती है।
इस बोली पर गुजराती और ब्रज भाषा, दोनों का ही कुछ-कुछ प्रभाव देखने को मिलता है। मेवाड़ क्षेत्र में मेवाड़ी बोली जाती है। उदयपुर, समंत, चित्तौड़गढ़ और भीलवाड़ा में मेवाड़ी बोली की छाप देखने को मिलती है।
इस बोली के उच्चारण में काफी मिठास सुनने को मिलती है। साथ ही, पुराने जमाने में कई नाटक भी इसी बोली में लिखे गए जाते थे। राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी हिस्से को हाड़ौती क्षेत्र कहते हैं और यहां बोली जाने वाली बोली हाड़ौती कहलाती है।
कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़ में इसी बोली का इस्तेमाल ज्यादा होता है। हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सीमाओं से सटे क्षेत्र में मेवाती बोली जाती है। ये बोली ब्रज भाषा और हिंदी से काफी प्रभावित है।
राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में वागड़ी बोली जाती है। इस बोली पर गुजराती भाषा का काफी प्रभाव दिखता है। झालावाड़, प्रतापगढ़ और मध्य प्रदेश से सटे इलाकों में मालवी बोली जाती है।
ये मेवाड़ी और मारवाड़ी का मिश्रण मानी जाती है। वहीं, मालवी- झालावाड़, प्रतापगढ़ और मध्य प्रदेश से सटे इलाकों में बोली जाती है। यह मेवाड़ी और मारवाड़ी का मिश्रण मानी जाती है।
वहीं, बहरोड़, कोटपूतली और कोटकासिम के क्षेत्रों में अहीरावटी बोली जाती है, जिसपर हरियाणवी का असर दिखाई देता है।

