राष्ट्रवाणी: इस कॉन्सेप्ट में छोटे ड्रोन लोइटरिंग UAV के तौर पर काम करेंगे. इनकी भूमिका उनके हथियारों और सेंसर के आधार पर अलग-अलग हो सकती है. कुछ ड्रोन निगरानी या जानकारी जुटाने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं. दूसरे ड्रोन को अलग तरह के मिशन के लिए तैयार किया जा सकता है. इस तरह एक ही मदरशिप से कई तरह के काम लिए जा सकेंगे. हालांकि कंपनी ने अभी यह नहीं बताया है कि एक मदरशिप कितने छोटे ड्रोन ले जा सकेगा. इस सिस्टम में एआई आधारित तकनीक और सुरक्षित संचार व्यवस्था को भी शामिल करने की बात कही गई है. एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन के जरिए मिशन की जानकारी साझा करने और जरूरी निर्देश भेजने में मदद मिल सकती है. छोटे UAV के नेविगेशन और मदरशिप से उनके तालमेल के लिए भी तकनीकी व्यवस्था विकसित करनी होगी. लेकिन केवल एआई का इस्तेमाल होने से यह नहीं माना जा सकता कि ड्रोन खुद ही लक्ष्य पहचानकर हमला करने में सक्षम होंगे. कंपनी ने अभी इनकी स्वायत्तता का पूरा विवरण नहीं दिया है. कॉन्सेप्ट सामने आने के बावजूद इसकी वास्तविक क्षमता को लेकर कई बातें स्पष्ट नहीं हैं. मसलन मदरशिप कितनी दूर तक उड़ सकेगा. यह कितनी देर हवा में रह पाएगा और इसका पेलोड कितना होगा. छोटे ड्रोनों की संख्या और उनकी रेंज को लेकर भी जानकारी नहीं दी गई है. युद्ध जैसे चुनौतीपूर्ण माहौल में संचार बाधित होने या नेविगेशन में दिक्कत आने पर सिस्टम कैसे काम करेगा यह भी अहम होगा. हथियारों के इस्तेमाल पर मानवीय नियंत्रण बनाए रखना भी जरूरी होगा. मदरशिप से छोटे ड्रोन लॉन्च करने की तकनीक पर दुनिया के कई देशों में दिलचस्पी बढ़ रही है. इसका एक बड़ा फायदा यह है कि छोटे UAV को दूर तक ले जाकर एक साथ तैनात किया जा सकता है. भारत में भी ऐसी तकनीक पारंपरिक UAV और लोइटरिंग हथियारों के साथ काम आ सकती है. लेकिन इसकी उपयोगिता का फैसला केवल कॉन्सेप्ट से नहीं होगा. असली कसौटी इसकी क्षमता, लागत, रखरखाव और मौजूदा सैन्य कमांड सिस्टम के साथ तालमेल होगा. PushpakO2 की पहल दिखाती है कि भारतीय निजी कंपनियां भी उन्नत एयरोस्पेस तकनीक पर काम कर रही हैं. फिलहाल इसे भविष्य की एक संभावित तकनीक के तौर पर ही देखना चाहिए. QR स्कैन करें, डाउनलोड करें News18 ऐप या वेबसाइट पर जारी रखने के लिए यहां क्लिक करें
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