राष्ट्रवाणी (छत्तीसगढ़ ब्यूरो): एक महिला के सुन्नी समुदाय से आने के बावजूद शिया मुस्लिम व्यक्ति से विवाह करने के बाद उठा विवाद अब अदालत के फैसले के साथ सामने आया है. इस विवाह के कुछ ही दिनों बाद स्थानीय मस्जिद कमेटी द्वारा कथित तौर पर एक फतवा जारी किया गया, जिसमें विवाह में शामिल लोगों को इस्लाम से बाहर बताने और उनके सामाजिक बहिष्कार का फरमान सुनाए जाने का दावा किया गया था. मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व फैसले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि फतवा किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकारों को खत्म या प्रभावित नहीं कर सकता. अदालत ने कहा कि फतवे का कोई बाध्यकारी कानूनी प्रभाव नहीं होता है और इसे इस तरह लागू नहीं किया जा सकता जिससे किसी व्यक्ति के अधिकारों को नुकसान पहुंचे. हालांकि, अदालत ने अपने आदेश में यह बात भी दर्ज की कि यह एक स्वीकार्य स्थिति है कि समाज में फतवे जारी किए जाते रहे हैं, लेकिन कानून की नजर में इनकी कोई कानूनी हैसियत नहीं होती. यह पूरा मामला एक भाई-बहन की याचिका से जुड़ा है, जो सुन्नी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. बहन की बेटी का विवाह एक शिया मुस्लिम व्यक्ति के साथ संपन्न हुआ था. याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि इस अंतर-संप्रदाय विवाह के केवल छह दिन बाद स्थानीय जामा मस्जिद प्रबंध समिति के सदस्यों ने एक फतवा जारी कर दिया. इसमें दावा किया गया कि इस शादी में शामिल होने वाले लोगों का निकाह अमान्य हो गया है और उन्हें दोबारा निकाह करने के साथ-साथ परिवार का सामाजिक बहिष्कार करने का निर्देश दिया गया है.याचिकाकर्ता भाई ने अदालत के सामने यह बात भी रखी कि यह फतवा वास्तव में एक व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था. याचिकाकर्ता ने पहले छत्तीसगढ़ राज्य वक्फ बोर्ड से मस्जिद कमेटी के सदस्यों द्वारा की जा रही वित्तीय अनियमितताओं और गबन की शिकायत की थी. इस शिकायत के आधार पर वक्फ बोर्ड ने संबंधित कमेटी को भंग करके एक प्रशासक नियुक्त किया था और मामले की जांच शुरू की थी. इसी खुन्नस में आकर कमेटी द्वारा यह फरमान जारी किया गया, जिससे उनके मौलिक अधिकारों और गरिमा का हनन हुआ. याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता मलय श्रीवास्तव ने अदालत में तर्क दिया कि विवाह एक निजी और पारिवारिक मामला था. मस्जिद कमेटी को इस तरह का फतवा जारी करके किसी की धार्मिक स्थिति तय करने या सामाजिक बहिष्कार का आदेश देने का कोई अधिकार नहीं है. उन्होंने कहा कि धार्मिक प्रथाओं के नाम पर इस तरह का मनमाना अधिकार इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह याचिकाकर्ताओं के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों पर हमला करता है.दूसरी ओर, केंद्र सरकार के वकील त्रिवेणी शंकर साहू ने स्पष्ट किया कि यह मामला निजी व्यक्तियों और धार्मिक कमेटी के कार्यों से जुड़ा है, इसलिए इसमें केंद्र सरकार की कोई सीधी भूमिका या लापरवाही सामने नहीं आती है. वहीं राज्य शासन की तरफ से अदालत को अवगत कराया गया कि प्राप्त शिकायत की नियमानुसार जांच की गई थी. उप पुलिस अधीक्षक द्वारा सौंपी गई जांच रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद अदालत ने पाया कि पुलिस जांच में ऐसा कोई फतवा जारी होने या किसी भी प्रकार का सामाजिक बहिष्कार लागू होने का कोई तथ्य सामने नहीं आया है. मामले में कोई संज्ञेय अपराध न पाए जाने के कारण प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई थी.छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता अपने दावों के समर्थन में कोई ठोस सामग्री या सबूत पेश करने में विफल रहे हैं. पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में केवल आरोपों के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत कोई राहत प्रदान नहीं की जा सकती. इन आधारों के साथ अदालत ने याचिका को निरस्त कर दिया, हालांकि याचिकाकर्ताओं को कानून के अनुसार अन्य उपलब्ध कानूनी विकल्पों का उपयोग करने की छूट दी गई है. गुरूवार, 05 नवम्बर 2026 गुरू, 05 नव. 2026 | 05:17 प्रधानमंत्री खबरें, वीडियो और शॉर्ट्स — एक ही जगह ब्रेकिंग न्यूज़ और बड़ी खबरें सबसे पहले आपके पास।
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