नयी दिल्ली. छत्तीसगढ़ के वन विभाग ने कहा है कि वह वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) के तहत आदिवासी समुदायों को दी गई वन भूमि का प्रबंधन तब तक करेगा जब तक कि केंद्र सरकार इन वनों के प्रबंधन के लिए कोई योजना उपलब्ध नहीं कराती. पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह कदम कानून के विरुद्ध है, जो वनवासियों को अपने वनों की सुरक्षा और प्रबंधन का अधिकार देता है.

प्रधान मुख्य वन संरक्षक और वन बल के प्रमुख वी श्रीनिवास राव ने 15 मई को जारी एक पत्र में 2020 के एक आदेश का हवाला दिया, जिसमें वन विभाग को सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों को लागू करने के लिए नोडल एजेंसी बनाया गया था. जनजातीय अधिकार समूहों की कड़ी आलोचना के बाद उस आदेश को वापस ले लिया गया. राव ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने 1996 के टी एन गोदावर्मन मामले में निर्देश दिया था कि वनों का प्रबंधन वैज्ञानिक तरीके से तथा उचित योजना के साथ किया जाना चाहिए.

इसके आधार पर उन्होंने कहा कि पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय कार्य योजना संहिता-2023 का पालन सभी वन क्षेत्रों के लिए किया जाना चाहिए, जिनमें सामुदायिक नियंत्रण वाले क्षेत्र भी शामिल हैं. उन्होंने जनजातीय कार्य मंत्रालय (एमओटीए) और पर्यावरण मंत्रालय के 14 मार्च के संयुक्त पत्र का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि एमओटीए सामुदायिक वन संसाधन अधिकार क्षेत्रों के प्रबंधन के लिए एक मॉडल योजना तैयार करेगा और इसे राज्यों के साथ साझा करेगा. छत्तीसगढ़ के वन विभाग ने कहा कि उसने छह मार्च को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को पत्र लिखकर योजना के बारे में जानकारी मांगी थी.

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