इंदौर. मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने इंदौर की शाह बानो बेगम की बेटी की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें हिन्दी फिल्म ‘हक’ की रिलीज पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया है. अदालत ने इसे खारिज करते हुए कहा कि याचिका में कोई ठोस आधार नहीं है और किसी व्यक्ति की निजता या प्रतिष्ठा का अधिकार उसके जीवनकाल के बाद समाप्त हो जाता है.
अदालत के इस फैसले के साथ ही सात नवंबर (शुक्रवार) को फिल्म के परदे पर प्रर्दिशत किये जाने का रास्ता साफ हो गया है. फिल्म ‘हक’ में यामी गौतम धर और इमरान हाशमी मुख्य भूमिकाओं में हैं. यह फिल्म शाह बानो से जुड़े उस बहुर्चिचत प्रकरण से प्रेरित है जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 1985 में उच्चतम न्यायालय ने तलाक के बाद मुस्लिम महिलाओं के लिए भरण-पोषण के संबंध में ऐतिहासिक फैसला सुनाया था.
वर्ष 1992 में शाह बानो बेगम का इंतकाल हो गया था. फिल्म ‘हक’ की रिलीज रुकवाने के लिए उनकी बेटी सिद्दिका बेगम खान ने याचिका दायर करके उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था. याचिका के प्रतिवादियों की फेहरिस्त में केंद्र सरकार, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) और फिल्म ‘हक’ के निर्देशक सुपर्ण एस. वर्मा के साथ इस फिल्म से जुड़ी तीन निजी कंपनियां शामिल थीं.
उच्च न्यायालय में बहस के दौरान याचिकाकर्ता के वकील तौसीफ वारसी ने कहा कि यह फिल्म उनकी मुवक्किल के परिवार की सहमति के बिना बनाई गई है और इसमें उनकी दिवंगत मां के निजी जीवन से जुड़े प्रसंगों का गलत तरह से चित्रण किया गया है.
सिद्दिका बेगम खान के वकील ने फिल्म के टीजर और ट्रेलर की विषयवस्तु पर आपत्ति जताई और तर्क दिया कि प्रतिवादियों के कृत्य निजता और सम्मान के अधिकार से संबंधित भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हैं और इन कृत्यों से याचिकाकर्ता और उनकी दिवंगत मां (शाह बानो) की पारिवारिक स्थिति और प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है.
याचिका पर सुनवाई के दौरान फिल्म से जुड़ी कंपनियों के वकीलों ने इन दलीलों को खारिज किया. उन्होंने कहा कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने फिल्म को प्रमाणपत्र प्रदान किया है जिससे स्पष्ट है कि फिल्म नियम-कायदों और दिशा-निर्देशों के अनुरूप है. अदालत ने सभी संबद्ध पक्षों की दलीलें सुनने के बाद चार नवंबर (मंगलवार) को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था जिसकी प्रति याचिकाकर्ता को बृहस्पतिवार को मिली.
उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति प्रणय वर्मा ने अपने फैसले में कहा,”मेरा सुविचारित मत है कि याचिकाकर्ता इस मामले में हस्तक्षेप का कोई भी कारण प्रस्तुत करने में विफल रही हैं. इसके फलस्वरूप याचिका में कोई दम नजर नहीं आता और इसे खारिज किया जाता है.” याचिका पर सुनवाई के दौरान फिल्म ‘हक’ के निर्माताओं ने अदालत के सामने एक अस्वीकरण (डिस्क्लेमर) भी पेश किया जिसे फिल्म से पहले दिखाया जाएगा.
‘डिस्क्लेमर’ में कहा गया,”यह फिल्म जिग्ना वोरा द्वारा लिखित अंग्रेजी पुस्तक ‘बानो: भारत की बेटी’ का नाट्य और काल्पनिक रूपांतरण है और यह मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम व अन्य मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के 1985 के ऐतिहासिक फैसले और उससे जुड़ी घटनाओं से प्रेरित है. यह फिल्म किसी व्यक्ति की बायोपिक या उसके जीवन पर केंद्रित वृत्तचित्र नहीं है.” उच्च न्यायालय ने ‘डिस्क्लेमर’ का हवाला देते हुए कहा कि फिल्म निर्माण को लेकर कुछ हद तक रचनात्मक छूट दी जा सकती है और ऐसा नहीं कहा जा सकता कि इसमें कोई सनसनीखेज या गलत चित्रण किया गया है.
एकल पीठ ने सभी संबद्ध पक्षों की दलीलों पर गौर के बाद अलग-अलग अदालतों के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा,”इस प्रकार स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है कि किसी व्यक्ति की निजता या प्रतिष्ठा का अधिकार उसके जीवनकाल के बाद समाप्त हो जाता है. चूंकि श्रीमती शाह बानो अब जीवित नहीं हैं, इसलिए उनकी निजता और प्रतिष्ठा का अधिकार भी उनके साथ ही समाप्त हो गया है.” शाह बानो बेगम ने 1978 में अपने वकील पति मोहम्मद अहमद खान द्वारा तलाक दिए जाने के बाद उनसे गुजारा-भत्ता पाने के लिए स्थानीय अदालत में मुकदमा दायर किया था.
शाह बानो की लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद उच्चतम न्यायालय ने 1985 में इस महिला के पक्ष में फैसला सुनाया था. मुस्लिम संगठनों के विरोध प्रदर्शनों के बाद राजीव गांधी सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम बनाया था. इस कानून ने शाहबानो प्रकरण में शीर्ष न्यायालय के फैसले को अप्रभावी बना दिया था.

