राष्ट्रवाणी: प्रतिनिधि, कोरबा: हाथियों से आम लोगों की सुरक्षा के लिए किए जा रहे लेमरू हाथी अभ्यारण्य की प्रयास धरी की धरी रह गई हैं। कोरबा वन मंडल के हाथी प्रभावित क्षेत्र में लगे 23 में आधा दर्जन से भी अधिक सजग हूटर एप तकनीकी खराबी की वजह से बंद पड़ी है। कटघोरा वन मंडल के प्रभावित क्षेत्र के सात गांव में सामुदायिक भवन के निर्माण को अभी तक स्वीकृति नहीं मिल सकी है। खेतों में रोपाई लिए तैयार किए जा रहे थरहा की वजह से रहवासी क्षेत्र आसपास में हाथी मंडराने लगे हैं। हाथियों की वजह से फसल नुकसान का दौर फिर से शुरू हो गया है। पांच साल के भीतर हाथियों के विचरण का दायरा अंबिकपुर कोरबा, रायगढ़ से बढ़कर बिलासपुर जांजगीर व सक्ती, तक बढ़ गई है। बहरहाल हाथियों से सुरक्षा के लिए जितने भी उपाय किए जा रहे उससे बढ़ नुकसानी का दायरा बढ़ रहा है। मानसून का साथ मिलने कृषि कार्य में प्रगति आने लगी है वहीं हाथी प्रभावित वनांचल क्षेत्रों के किसानों थरहा तैयार होने के बाद भी रोपाई का इंतजार है। हाथियों से आम लोगाें की जान माल से सुरक्षा के लिए कोरबा वन मंडल के 23 गांवों में सजग एप लगाए गए हैं। जिस तरह हाथियों की संख्या बढ़ रही है और उनके आवागमन मार्ग में बदलाव हुआ उस लिहाज से एप अनुपयोगी साबित हो रहा है। गेरांव में एप लगा है लेकिन उसके निकट गांव बताती में यह सुविधा नहीं है। ऐसे में बताती की ओर दल के पहुंचने की सूचना नहीं मिल पाती और ग्रामीण को फसल नुकसान का सामना करना पड़ता है। घोटमार, चारमार, गुरमा सहित कई गांव में लगे हूटर तकनीकी खराबी के कारण बंद हो चुके हैं। हाथियों से सुरक्षा के लिए हाथी मित्र दल गठित किया गया है। ड्रोन कैमरे से हाथियों से निगरानी की जा रही है। इसके बाद भी ग्रामिणों की मौत और फसल नुकसान का दायरा कम होने का नाम नहीं ले रहा। पूर्व कलेक्टर संजीव झा ने ग्राम लटियाटोला, केन्दहाडांड, बनखेता, गोलाबहरा, बोकरामुडी, बालमपुर एवं तराईनार में एक-एक सामुदायिक भवन स्वीकृत को स्वीकृति दी थी। पांच साल से भी अधिक समय गुजर जाने के बाद इसकी शुरूआत नहीं हुई है। गांव में हाथी आने से आज भी लोगों को दूसरेे गांव जाकर अपने स्वजनों के घर शरण लेना पड़ता है। जिले के कटघोरा वन मंडल पसान, केंदई व कोरबा वन मंडल के पसरखेत ऐसे वन परिक्षेत्र हैं जहां वर्ष भर हाथियों का विचरण जारी रहता है। हाथियों से होने वाली फसल नुकसान में प्रति एकड़ 21 हजार रूपये दिए जाने नियम है। किसानों का कहना है नुकसान की तुलना में यह पर्याप्त नहीं है। पीएमबीमा में हाथियों से फसल नुकसान को शामिल नहीं किए जाने की वजह से योजना का लाभ किसानों को नहीं मिल रहा है। नन्हे हाथियों के साथ होने कई गांवों के निकट विचरण कर रहे दल संवेदनशील और आक्रामक हो गए हैं। कोरबा वनमंडल कुदमुरा और पसरखेत रेंज में 20 से भी अधिक हाथी विचरण कर रहे हैं। दल पांच नन्हे हाथी शामिल है। वन परिक्षेत्र के अधिकारी की माने नन्हे हाथी साथ में होने के कारण दल जल्दी से स्थल नहीं बदलते। इसी तरह जटगा, एतमानगर, पसान के निकट विचरण कर रहे 40 में छह नन्हे हाथी शामिल हैं। एक ही जगह में लंबी अवधि तक रूक थरहा फसल को नुकसान पहुंचा रहे है। सौर फेंसिंग व कालर आइडी की युक्ति नहीं आई काम हाथियों का लोकेशन जानने के लिए वन विभाग की ओ से तीन साल पहले दलों के कुछ हाथियों के गले में कालर आइडी लगाया था। मौसमी मार की वजह से से ये कालर आइडी नष्ट हो चुके है। लाखों खर्च कर लगाए कालर आइडी अनुपयोगी हो चके हैंं। दलों की संख्या बढ़ने और समय पर लोकेशन नहीं मिलने से ग्रामीण ही नहीं बल्कि जमीनी जस्तर पर काम करने वाले बीट गार्ड के लिए भी यह समस्या बनी है। कोरबा वन मंडल के चार गांवों में लगाई गई सौर फेंसिंग भी काम नहीं आई है हाथियों के बढ़ते उत्पात के बीच मानव-हाथी द्वंद्व भी बढ़ गया है। वन विभाग के पास पर्याप्त अमला नही है। ऐसे में लोग जान माल की रक्षा के स्वयं आगे आने पर मजबूर हैं। फसल को हाथियों से बचाने के लिए करंट तार बिछाने की घटना भी सामने आ चुकी है। गांव अथवा उसके आसपास हाथियों के आने की सूचना नहीं मिलने से ग्रामीणों को खतरे के साए में जीवन बसर करना पड़ रहा है। हाथी विचरण को देखते हुए प्रभावित क्षेत्रों के ग्रामीणों के गजदल, हाथी मित्र, वन कर्मी आदि के माध्यम से सजग किया जा रहा है। इसके अलावा ड्रोन कैमरे से भी निगरानी की जा रही है। कुछ जगहों में हूटर बंद हो चुके हैं जिन्हें शीघ्र सुधार कराया जाएगा। सूर्यकांत सोनी, उप वनमंडलाधिकारी, कोरबा

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