राष्ट्रवाणी: प्रतिनिधि, बिलासपुरः जीवनभर अंगूठे की स्याही से अपनी पहचान साबित करने की विवशता आखिरकार अक्षर ज्ञान की रोशनी में बदल गई। कोटा विकासखंड के वनांचल स्थित शासकीय प्राथमिक शाला अमने में रविवार को उल्लास साक्षरता महापरीक्षा के दौरान शिक्षा और पारिवारिक अपनत्व का अद्भुत दृश्य दिखा, जहां मां फगनी बाई, बेटा बैशाखु यादव और बहू देवी बाई ने एक साथ बैठकर पर्चा हल किया।
जिले के 677 केंद्रों में आयोजित महापरीक्षा में 13,080 शिक्षार्थियों ने कलम थामकर अपने साक्षर होने का मूल्यांकन कराया। अमने स्कूल में जब बुजुर्ग मां फगनी बाई अपने बेटे और बहू के साथ परीक्षा कक्ष में बैठीं, तो वहां मौजूद शिक्षक और सहपाठी भावुक हो उठे। जिस उम्र में हाथ कांपने लगते हैं, उस पड़ाव में बेटे और बहू का संबल पाकर मां ने पूरे आत्मविश्वास के साथ शब्दों को पन्नों पर उकेरा।
इसी केंद्र पर जेठानी पिलिया बाई मरावी और देवरानी हुलसिया बाई मरावी ने भी चूल्हा-चौका छोड़कर एक साथ परीक्षा दी और साबित किया कि सीखने की कोई उम्र सीमा नहीं होती। जिलेभर के केंद्रों में बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक में गजब का उत्साह रहा। कई केंद्रों पर तो-तीन पीढ़ियों ने एक साथ बैठकर साक्षरता का इम्तिहान दिया।
उल्लास महापरीक्षा में कई केंद्रों पर गृहस्थी का पहिया साथ खींचने वाले दंपती एक साथ डेस्क पर कलम थामे नजर आए। दिनभर रोजी-मजदूरी और घर की जिम्मेदारियों में उलझे रहने वाले पति-पत्नी ने साथ बैठकर पर्चा हल किया। उन्होंने बताया कि अब बैंक के काम या बाजार के हिसाब-किताब के लिए किसी का मोहताज नहीं होना पड़ेगा।
अक्षर ज्ञान की रोशनी केंद्रीय जेल की सलाखों को भी पार कर गई। जेल में बंद 203 बंदियों ने भी पूरे उत्साह के साथ महापरीक्षा में भाग लिया, जिनमें 171 पुरुष और 32 महिला बंदी शामिल रहे। अपराध और पश्चाताप के अंधेरे से निकलकर बंदियों ने कलम के जरिए नई जिंदगी और सुधार की राह चुनी।
सीखने की कोई उम्र नहीं होती यह उल्लास महापरीक्षा ने साबित कर दिया है। अमने स्कूल में मां, बेटा और बहू तथा देवरानी-जेठानी का साथ परीक्षा देना समाज के लिए अत्यंत प्रेरक है। 13 हजार से अधिक लोगों का साक्षर होना जिले के लिए गौरव का विषय है।
संजय अग्रवाल, कलेक्टर बिलासपुर
