इंदौर. इंदौर में 100 करोड़ रुपये के अनुमानित आकार वाले फर्जी रजिस्ट्री कांड के खुलासे के बाद पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज करके जांच शुरू कर दी है जिसमें राज्य सरकार के पंजीयन विभाग और इंदौर नगर निगम के कर्मचारी भी संदेह के घेरे में हैं. अधिकारियों ने सोमवार को यह जानकारी दी.

अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त दीशेष अग्रवाल ने बताया कि पंजीयन विभाग के एक अधिकारी की शिकायत पर पंढरीनाथ थाने में अज्ञात आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड विधान की धारा 420 (धोखाधड़ी), धारा 467 (दस्तावेजों की जालसाजी) और अन्य संबद्ध प्रावधानों के तहत रविवार देर रात मामला दर्ज किया गया.

अग्रवाल ने बताया,”पंजीयन विभाग के रिकॉर्ड रूम में कई संदिग्ध दस्तावेज मिलने के बाद जिला प्रशासन ने पांच सदस्यीय जांच समिति बनाई थी. इस समिति की जांच रिपोर्ट के आधार पर यह मामला दर्ज किया गया है. सबूतों के आधार पर आरोपियों की पहचान की जा रही है.” मामले की जांच से जुड़े एक अन्य अधिकारी ने बताया कि फर्जी रजिस्ट्री कांड में कुछ स्थानीय नागरिकों के साथ ही पंजीयन विभाग और नगर निगम के कर्मचारी भी संदेह के घेरे में हैं.

उन्होंने बताया कि पंजीयन विभाग के रिकॉर्ड रूम में अलग-अलग संपत्तियों के पंजीयन के ऐसे दस्तावेज मिले हैं जो इनके वास्तविक क्रेता-विक्रेताओं के ब्योरे से मेल नहीं खा रहे हैं और सरकारी रजिस्टर में संबंधित विक्रेताओं के अंगूठों की छाप भी दर्ज नहीं है.
अधिकारी ने बताया कि इस मामले के तहत कुल 18 संपत्तियों के संदिग्ध दस्तावेजों की जांच की जा रही है जिनमें आवासीय और वाणिज्यिक जमीनों व मकानों के साथ ही कृषि भूमियां भी शामिल हैं.

अधिकारी के मुताबिक, स्थानीय बाजार में प्रचलित वर्तमान दरों के मुताबिक इन 18 संपत्तियों की कुल कीमत 100 करोड़ रुपये के आस-पास आंकी जा रही है. उन्होंने बताया कि इन संपत्तियों के संदिग्ध दस्तावेज वर्ष 1959 से लेकर 2000 के बीच के हैं.
अधिकारी ने बताया कि फर्जी रजिस्ट्री कांड की विस्तृत जांच की जा रही है.

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