राष्ट्रवाणी: प्रतिनिधि, रायपुर। सावन माह में निकलने वाली कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कुटीर उद्योग और छोटे व्यापारियों के लिए भी बड़ा आर्थिक आधार बन गई है। कन्फेडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के राष्ट्रीय वाइस चेयरमैन अमर पारवानी सहित अन्य पदाधिकारियों ने बताया कि कांवड़ और उससे जुड़ी धार्मिक सामग्री का मौसमी कारोबार देशभर में करीब पांच हजार करोड़ रुपये का है। उत्तराखंड के हरिद्वार और झारखंड के देवघर जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों पर हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालुओं के पहुंचने से कांवड़ों की मांग कई गुना बढ़ जाती है। इस मांग के चलते उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और झारखंड के कई क्षेत्रों में संचालित पारंपरिक कांवड़ निर्माण उद्योग को बड़ा बाजार मिलता है। इस उद्योग से जुड़े हजारों कारीगर हर वर्ष लाखों कांवड़ तैयार करते हैं। पारवानी के अनुसार कांवड़ निर्माण में बांस, लकड़ी, रंगीन कागज, कपड़ा, झंडे, धार्मिक प्रतीक, एलईडी लाइट और अन्य सजावटी सामग्री का उपयोग होता है। इससे हस्तशिल्प, परिवहन, सजावटी सामग्री, धार्मिक वस्तुओं और छोटे व्यापारियों सहित कई क्षेत्रों को रोजगार और व्यापार मिलता है। साधारण कांवड़ की कीमत 100 से 500 रुपये तक होती है, जबकि विशेष रूप से सजाई गई कांवड़ों की कीमत पांच हजार रुपये या उससे अधिक तक पहुंच जाती है। हरिद्वार (उत्तराखंड): देश के सबसे बड़े और प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल, जहां हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालु जल लेने पहुंचते हैं और कांवड़ों की मांग में भारी वृद्धि होती है। देवघर (झारखंड): यहां भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने से कांवड़ यात्रा का एक विशाल मौसमी बाजार संचालित होता है। उत्तर प्रदेश और बिहार के क्षेत्र: इन राज्यों के कई क्षेत्रों में पारंपरिक कांवड़ निर्माण उद्योग संचालित होता है, जो देश के विभिन्न बाजारों को अपनी सामग्रीीय आपूर्ति प्रदान करता है।

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