राष्ट्रवाणी: प्रतिनिधि, रायपुर। भारतीय सेना की महार रेजीमेंट के बहादुर नायक विजय डागा, जिन्होंने रायपुर के टिकरापारा की तंग गलियों से निकलकर दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र कारगिल में अपने शौर्य का परिचय दिया, वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध में पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने वाले वीर सैनिकों में शामिल रहे। इस ऐतिहासिक विजय के दौरान उन्होंने अपने बंकर के पांच साथियों को बलिदान होते अपनी आंखों से देखा। कारगिल युद्ध की यादें आज भी उन्हें भावुक कर देती हैं। युद्ध के दौरान के हालात, दुश्मन का सामना और सैनिकों के जीवन से जुड़े कई प्रेरक अनुभव उन्होंने साझा किए। सवाल:- लड़ाई के बीच सैनिकों के खाने-पीने का इंतजाम कैसे होता था? जवाब:- उस समय भूख का एहसास ही नहीं होता। हमें खाना नहीं चाहिए होता, बस इतना चाहिए कि गोला-बारूद मिलता रहे ताकि दुश्मन का मुकाबला कर सकें। युद्ध के दौरान ताजा भोजन मिलने का सवाल ही नहीं उठता। हम अपने साथ पैक्ड फूड ले जाते थे। इसके अलावा कैल्शियम और विटामिन-सी की गोलियां, बिस्कुट और कुछ ऐसी खाद्य सामग्री रहती थी, जिसे बर्तन में गर्म करके खाया जा सके। यदि किसी पोस्ट पर कब्जा हो जाता और अवसर मिलता, तभी अच्छा भोजन नसीब होता। हालांकि वह भी आसान नहीं था, क्योंकि खाली समय में भी सैनिकों को अपने हथियारों की सफाई और रखरखाव करना पड़ता था। सवाल:- मई 1999 में जब युद्ध शुरू हुआ, तब आप कहां तैनात थे? आपको कब बताया गया कि अब युद्ध के लिए जाना है? जवाब:- हमारी नौ महार बटालियन की एक कंपनी कारगिल से आगे दुर्गम तुरतुक सेक्टर में तैनात थी। उस समय युद्ध अपने चरम पर था। पाकिस्तान की सेना नियंत्रण रेखा (एलओसी) पार कर भारतीय क्षेत्र के बड़े हिस्से पर कब्जा जमाने की कोशिश कर रही थी। हम लोग तुरतुक सेक्टर के 5112 हिल पर एक बंकर में तैनात थे। हमारी दिनचर्या दुश्मन की हर फायरिंग का मुंहतोड़ जवाब देना थी। सवाल:- कारगिल युद्ध के दौरान घरवालों से संपर्क हो पाता था? जवाब:- उस समय घरवालों से बात करना बेहद मुश्किल था। कभी-कभी सैटेलाइट फोन मिलता था, जिसमें हम अपना संदेश रिकार्ड कर देते थे। उस दौर में मोबाइल फोन नहीं थे, इसलिए हमारी बात कभी-कभार ही परिवार तक पहुंच पाती थी। सवाल:- युद्ध के दौरान क्या आपको घरवालों की याद आती थी? जवाब:- युद्ध के समय हम अपने जज्बातों को हावी नहीं होने देते। देश की सीमाओं की रक्षा के लिए हम पूरी दृढ़ता से खड़े रहते हैं। हमें पता होता है कि कोई भी पल जिंदगी का आखिरी पल हो सकता है। हमारा एकमात्र लक्ष्य दुश्मन को हराकर विजय हासिल करना होता है। सेना की ट्रेनिंग हमें इसी मानसिकता के लिए तैयार करती है। सवाल:- जब पाकिस्तानी सैनिकों से आमना-सामना हुआ तो माहौल कैसा था? जवाब:- पाकिस्तानी सेना ऊंची पहाड़ियों पर तैनात थी, इसलिए उन्हें सामरिक बढ़त मिली हुई थी। वे हमारी गतिविधियों को आसानी से देख सकते थे। इसके बावजूद हमारी ओर से पूरी तैयारी थी और हम हर हमले का करारा जवाब देते थे। सवाल:- क्या युद्ध शुरू होने से पहले ही आपकी पोस्टिंग कारगिल क्षेत्र में हो चुकी थी? जवाब:- हां। हमारी कंपनी पहले मश्कोह घाटी के पास द्रास सेक्टर में तैनात थी। उसी दौरान वहां आईईडी ब्लास्ट की घटना हुई थी। कुछ दिनों बाद हमारी तैनाती बटालिक क्षेत्र में हुई और फिर वहां से हमें कारगिल के पानीखर गांव भेजा गया, जो पाकिस्तान की ओर जाने वाले पहाड़ी मार्ग के बेहद करीब था। सवाल:- लड़ाई के दौरान सबसे मुश्किल पल कौन-सा था? जवाब:- (इस सवाल पर विजय डागा बेहद भावुक हो गए। उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। कुछ देर रुकने के बाद उन्होंने आगे कहा।) बंकर में साथियों के लिए पानी लेने जाना मेरे जीवन का सबसे कठिन क्षण था। हमारे बंकर में कुल सात सैनिक थे। पानी लाने के लिए पहाड़ से नीचे जाना पड़ता था। मैं और मेरा एक साथी कुछ देर पहले ही पानी लेने नीचे गए थे। इसी दौरान लगभग दस मिनट के भीतर पाकिस्तान की ओर से हमारे बंकर पर मोर्टार के तीन गोले दागे गए। बंकर में मौजूद हमारे पांच साथी शहीद हो गए। मातृभूमि के लिए बलिदान देना गर्व की बात है, लेकिन अपने साथियों को खोने का दर्द आज भी मेरे दिल में जिंदा है। उनकी शहादत व्यर्थ नहीं गई। हमने कारगिल का युद्ध जीता और तिरंगे का मान बनाए रखा। आज भी उन पांचों साथियों की याद मेरे दिल में रची-बसी है। वह पल मैं कभी नहीं भूल सकता।

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