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Home»Business»मिडिल ईस्ट तनाव का भारत पर बड़ा असर: 25 लाख लोग गरीबी की कगार पर, UN रिपोर्ट ने दी चेतावनी – |
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मिडिल ईस्ट तनाव का भारत पर बड़ा असर: 25 लाख लोग गरीबी की कगार पर, UN रिपोर्ट ने दी चेतावनी – |

Team RashtrawaniBy Team RashtrawaniApril 14, 2026No Comments4 Mins Read
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मिडिल ईस्ट तनाव का भारत पर बड़ा असर: 25 लाख लोग गरीबी की कगार पर, UN रिपोर्ट ने दी चेतावनी –  |
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भारत में तेल, महंगाई और रोजगार पर बढ़ता दबाव: आने वाले समय की चुनौतियां
बढ़ता तनाव और भारत में गरीबी का खतरा-पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब सीधे भारत पर भी दिखने लगा है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, इस तनाव के कारण भारत में करीब 25 लाख लोग गरीबी की सीमा के नीचे आ सकते हैं। यह संख्या पहले से कहीं ज्यादा है। इस संकट से लोगों की आमदनी, खर्च करने की क्षमता और जीवन स्तर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।

महंगाई और बढ़ते खर्च से आम आदमी की मुश्किलें-संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की रिपोर्ट बताती है कि ईंधन, माल ढुलाई और जरूरी सामानों की कीमतें बढ़ने से आम जनता की जेब पर भारी असर पड़ रहा है। खाने-पीने की चीजें महंगी हो रही हैं, जिससे घर का बजट बिगड़ रहा है और खरीदने की क्षमता कम हो रही है। इससे गरीबी का खतरा और बढ़ रहा है।

एशिया-प्रशांत क्षेत्र को भारी आर्थिक नुकसान-यह संकट सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। पूरी दुनिया में करीब 88 लाख लोग गरीबी की ओर बढ़ सकते हैं। खासकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र को लगभग 299 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है। दक्षिण एशिया में इसका असर सबसे ज्यादा होगा क्योंकि यहां की बड़ी आबादी कीमतों और आय में उतार-चढ़ाव से सीधे प्रभावित होती है।

भारत की अर्थव्यवस्था और विकास पर असर-रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इस संकट से भारत के मानव विकास सूचकांक (HDI) पर भी असर पड़ेगा। अनुमान है कि भारत को विकास में 0.03 से 0.12 साल तक का नुकसान हो सकता है। इसका मतलब है कि देश की प्रगति में थोड़ी गिरावट आ सकती है, जो लंबे समय तक महसूस की जाएगी।

तेल और गैस पर बढ़ती निर्भरता चिंता का विषय-भारत अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत से ज्यादा तेल आयात करता है, जिसमें अधिकांश हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। इसके अलावा गैस और उर्वरकों के लिए भी भारत इस क्षेत्र पर निर्भर है। इसलिए वहां का तनाव भारत की ऊर्जा आपूर्ति और कृषि क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है, जिससे लागत और बढ़ सकती है।

व्यापार और सप्लाई चेन पर संकट के बादल-इस संघर्ष के कारण व्यापार और सप्लाई चेन में रुकावटें आ रही हैं। माल ढुलाई महंगी हो गई है और डिलीवरी में देरी हो रही है। भारत के कुल निर्यात का लगभग 14 प्रतिशत और आयात का 20 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशिया से जुड़ा है। इस क्षेत्र की अस्थिरता का असर व्यापार पर साफ दिख रहा है।

रोजगार और छोटे कारोबारों पर खतरा-रिपोर्ट के अनुसार, खासकर छोटे और मझोले उद्योग (MSME) सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। लागत बढ़ने और कच्चे माल की कमी से इन उद्योगों को नुकसान होगा। इससे नौकरी जाने, काम के घंटे कम होने और कारोबार बंद होने जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों पर इसका ज्यादा असर होगा।

दवाइयों और मेडिकल सेक्टर की स्थिति-मेडिकल सेक्टर पर भी इस संकट का असर पड़ रहा है। कच्चे माल की कीमतें बढ़ने से मेडिकल उपकरण महंगे हो सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इनके दाम करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ सकते हैं, जबकि दवाओं की थोक कीमतों में पहले ही 10 से 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो चुकी है। इससे स्वास्थ्य सेवाएं महंगी हो सकती हैं।

खेती और खाद्य सुरक्षा को खतरा-खाद्य सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। अगर यह संकट लंबा चलता है, तो खरीफ सीजन की तैयारी प्रभावित हो सकती है, जो जून में शुरू होता है। उर्वरकों की सप्लाई में रुकावट से किसानों को परेशानी हो सकती है। फिलहाल कुछ स्टॉक मौजूद हैं, लेकिन लंबे समय तक स्थिति बनी रही तो मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

प्रवासी भारतीयों और रेमिटेंस पर असर-भारत के लाखों लोग खाड़ी देशों में काम करते हैं और वहां से पैसे भेजते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत को मिलने वाले कुल रेमिटेंस का 38-40 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। अगर वहां आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं, तो इसका असर भारत में परिवारों की आमदनी और खर्च पर भी पड़ेगा।

यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि तेल, महंगाई और रोजगार के मुद्दे आने वाले समय में भारत के लिए बड़ी चुनौतियां बन सकते हैं। इन समस्याओं से निपटने के लिए सरकार और समाज को मिलकर ठोस कदम उठाने होंगे ताकि आर्थिक स्थिरता और आम जनता की भलाई बनी रहे।

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