राष्ट्रवाणी: प्रतिनिधि,महासमुंद। महासमुंद जिले के देवरी गांव की प्रगतिशील महिला किसान रेणु छाबड़ा ने लीक से हटकर पारंपरिक खेती की राह छोड़ी और पचौली जैसी औषधीय एवं सुगंधित फसल अपनाकर आज लाखों रुपये की शानदार आय अर्जित कर रही हैं। वर्ष 2013 में महज 10 एकड़ भूमि से शुरू हुआ उनका यह सफर आज बढ़कर 50 एकड़ तक पहुंच चुका है। पचौली के सुगंधित तेल की देश-विदेश के बाजारों में लगातार बढ़ती मांग ने उनकी मेहनत को एक नई और राष्ट्रीय पहचान दिलाई है। रेणु न केवल खुद एक सफल किसान बनकर उभरी हैं, बल्कि वे 20 से अधिक किसानों को इसका व्यावहारिक प्रशिक्षण देकर उन्हें भी कम लागत में अधिक मुनाफे वाली खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। रेणु बताती हैं कि उन्हें बचपन से ही प्रकृति और हरियाली से विशेष लगाव रहा है। वे खेती-किसानी के क्षेत्र में कुछ ऐसा अलग करना चाहती थीं, जिससे कम क्षेत्र में भी बेहतर और आधुनिक आय प्राप्त की जा सके। इसी तलाश और जिज्ञासा के दौरान उन्हें पचौली की खेती के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2013 में मुंबई स्थित एक प्रतिष्ठित संस्थान से औषधीय एवं सुगंधित फसलों की आधुनिक खेती का विशेष प्रशिक्षण लिया। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्होंने अपने गृह ग्राम लौटकर पचौली की खेती की नींव रखी। शुरुआती दौर में उन्हें कई तरह की तकनीकी और व्यावसायिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार सीखते हुए इस खेती को एक सफल और मुनाफे वाले व्यवसाय में बदल दिया। पचौली की खेती में रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैविक खाद का उपयोग करना अधिक लाभदायक साबित होता है। वे फसलों की सेहत सुधारने के लिए मुख्य रूप से गोबर, गोमूत्र और गुड़ से तैयार प्राकृतिक ‘जीवामृत’ का उपयोग करती हैं। रेणु बताती हैं कि पचौली की खेती की सबसे बड़ी और खास विशेषता यह है कि एक बार पौधे खेत में तैयार हो जाने के बाद, उन्हीं पुराने पौधों से आगे के लिए नए पौधे आसानी से तैयार किए जा सकते हैं। इससे किसानों को बार-बार महंगे बीज खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती और खेती की कुल उत्पादन लागत काफी हद तक कम हो जाती है। खेती के गणित को समझाते हुए वे बताती हैं कि पचौली के एक एकड़ रकबे में करीब 12 हजार पौधे लगाए जाते हैं। इन पौधों की कटाई और प्रसंस्करण के बाद लगभग 30 लीटर तक शुद्ध सुगंधित तेल प्राप्त हो जाता है। उच्च गुणवत्ता का यह तेल बाजार में बेहद आकर्षक कीमत पर बिकता है, जिससे किसानों को तगड़ा मुनाफा हाथ लगता है। पचौली की पत्तियों से निकाले जाने वाले सुगंधित तेल की अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी मांग बनी रहती है। इस तेल का उपयोग प्रमुख रूप से महंगे परफ्यूम (इत्र), अगरबत्ती, साबुन, विभिन्न कॉस्मेटिक उत्पादों और कई प्रकार की बहुमूल्य आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माण में किया जाता है। यही मुख्य कारण है कि इसकी व्यावसायिक खेती किसानों के लिए बेहद फायदेमंद मानी जाती है। रेणु छाबड़ा अब तक छत्तीसगढ़ के अलावा देश के अन्य राज्यों के 20 से अधिक किसानों को पचौली की खेती का सफल प्रशिक्षण दे चुकी हैं। उनके मार्गदर्शन और प्रेरणा से अब उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश के किसान भी इस लाभकारी खेती को तेजी से अपना रहे हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि पारंपरिक फसलों के साथ-साथ यदि औषधीय एवं सुगंधित फसलों की खेती को सही तकनीक और बाजार की पूरी जानकारी के साथ अपनाया जाए, तो कम लागत में बेहतरीन आर्थिक आमदनी हासिल की जा सकती है।

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