नयी दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर 90 से अधिक वन अधिकार समूहों ने आरोप लगाया है कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) को ‘नष्ट’ करने का प्रयास कर रहा है. उन्होंने मांग की है कि पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव अपने उस कथित बयान को स्पष्ट करें जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘एफआरए’ के कारण वनों का क्षरण होता है. ‘पीटीआई भाषा’ ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से इस पर टिप्पणी के लिए संपर्क किया है और जवाब मिलने का इंतजार है.

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन और हिमाचल प्रदेश के हिमधारा पर्यावरण अनुसंधान एवं कार्य समूह सहित अन्य संगठनों ने 28 जून को लिखे अपने पत्र में कहा है कि पांच जून को एक समाचार पत्र में प्रकाशित एक बयान में यादव ने ”वन क्षरण के लिए वन अधिकार अधिनियम के तहत दिए गए अधिकारों को एक कारण बताया है.” पत्र की प्रतियां राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) और पर्यावरण, जनजातीय मामले और सामाजिक न्याय मंत्रालयों को भेजी गई हैं. उन्होंने इस बयान को ‘झूठा, भ्रामक, कानूनी रूप से गैर टिकाऊ तथा एफआरए की वैधता को कमजोर करने का प्रयास’ बताया.

उन्होंने आरोप लगाया कि यह पर्यावरण मंत्रालय द्वारा ‘नष्ट करने की लगातार श्रृंखला’ का हिस्सा है, जिसने वन विभाग की नौकरशाही के साथ मिलकर पिछले 16 वर्षों से एफआरए के कार्यान्वयन का ”कठोर विरोध किया है और उसे बाधित किया है.” समूहों ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि वे पर्यावरण मंत्रालय द्वारा एफआरए को नष्ट करने के प्रयासों को तत्काल रोकें.

उन्होंने यह भी मांग की कि यादव सार्वजनिक रूप से स्पष्टीकरण दें और एफआरए को वन क्षरण से जोड़ने वाले अपने बयान को वापस लें. पत्र में यह भी मांग की गई है कि मंत्रालय तुरंत उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) को एफआरए के तहत वन अतिक्रमणों की कानूनी स्थिति के बारे में सूचित करे तथा स्पष्ट रूप से बताए कि एफआरए कार्यान्वयन की प्रक्रिया पूरी होने तक अतिक्रमण पर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती.

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