राष्ट्रवाणी: प्रतिनिधि, राजनांदगांव। कभी जिले की सभ्यता, संस्कृति और गौरवशाली इतिहास की पहचान रही। प्राचीन मूर्तियां और दुर्लभ धरोहरें आज उपेक्षा का शिकार होती नजर आ रही हैं। जिला कार्यालय परिसर स्थित पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में रखी गई सैकड़ों वर्ष पुरानी ऐतिहासिक प्रतिमाएं, राजघराने के अस्त्र-शस्त्र, प्राचीन सिक्के, पारंपरिक परिधान तथा अन्य बहुमूल्य विरासतें पर्याप्त संरक्षण के अभाव में धूल फांक रही हैं। कई मूर्तियां टूट चुकी हैं, कई के अवशेष जमीन पर बिखरे पड़े हैं, जबकि शेष धरोहरों पर समय और लापरवाही की मार साफ दिखाई दे रही है। ऐसे में जिले की सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा और संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। पुरातत्व विभाग की स्थिति स्वयं इसकी बदहाली की कहानी बयां करती है। भवन की दीवारों में दरारें पड़ चुकी हैं, कई स्थानों पर जमीन धंस गई है और भवन की संरचना भी असुरक्षित दिखाई देती है। इसके बावजूद लंबे समय से मरम्मत नहीं कराई गई है। इससे न केवल वहां रखी अनमोल धरोहरों पर खतरा मंडरा रहा है, बल्कि कभी भी किसी बड़े हादसे की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। विभाग में जिले के विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त प्राचीन मूर्तियों के अलावा राजाओं के अस्त्र-शस्त्र, दुर्लभ सिक्के, छत्तीसगढ़ी पारंपरिक वेशभूषा और ऐतिहासिक महत्व की अनेक वस्तुएं सुरक्षित रखी गई हैं। लेकिन इन पर जमी धूल और रखरखाव की कमी यह दर्शाती है कि संरक्षण के लिए अपेक्षित संसाधन और व्यवस्थाएं उपलब्ध नहीं हैं। कई प्रतिमाएं क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, जबकि कुछ खुले स्थानों पर पड़ी हुई हैं। यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में जिले की यह अमूल्य विरासत हमेशा के लिए नष्ट होने का खतरा पैदा हो सकता है। इतिहासकारों और संस्कृति प्रेमियों का मानना है कि यदि यह संग्रहालय शहर के किसी प्रमुख सार्वजनिक स्थल, जैसे स्टेडियम परिसर, सृजन संवाद भवन या अन्य आसानी से पहुंच योग्य स्थान पर स्थापित किया जाता, तो यहां विद्यार्थियों, शोधार्थियों, साहित्यकारों, कलाकारों और पर्यटकों की नियमित आवाजाही होती। इससे नई पीढ़ी अपने इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ पाती तथा जिले में पर्यटन को भी बढ़ावा मिलता। वर्तमान में कलेक्ट्रेट परिसर के भीतर स्थित होने के कारण आम नागरिकों और पर्यटकों की पहुंच यहां तक सीमित है। संग्रहालय में प्रतिदिन मुश्किल से आठ से 10 लोग ही पहुंचते हैं। विभाग में कर्मचारियों की कमी भी एक बड़ी समस्या बनकर सामने आइ है। सीमित स्टाफ के कारण धरोहरों का संरक्षण, नियमित साफ-सफाई, वैज्ञानिक रखरखाव और व्यवस्थित प्रदर्शन प्रभावित हो रहा है। यदि समय रहते पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षित कर्मचारी और आधुनिक संरक्षण व्यवस्था उपलब्ध नहीं कराई गई तो आने वाली पीढ़ियां अपने इतिहास की इन अमूल्य निशानियों से वंचित हो सकती हैं।
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