राष्ट्रवाणी: प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने आरटीआई के तहत तीसरे व्यक्ति द्वारा विवाह पंजीयन से जुड़े दस्तावेज मांगने के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी सरकारी कार्यालय में दस्तावेज उपलब्ध होने मात्र से वह सार्वजनिक नहीं हो जाते। यदि सूचना किसी व्यक्ति की निजी जानकारी से संबंधित है और उसके खुलासे से निजता प्रभावित होने की आशंका है तो सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(जे) के तहत उसे देने से छूट है। हालांकि, बड़े जनहित के आधार पर ऐसी सूचना के खुलासे का रास्ता खुला रह सकता है। जस्टिस सचिन सिंह राजपूत ने अधिवक्ता डीके सोनी की ओर से दायर तीन अलग-अलग रिट याचिकाओं का एक साथ निराकरण करते हुए यह आदेश दिया। कोर्ट ने विवाह पंजीयन से संबंधित जानकारी मांगने वाली डब्ल्यूपीसी क्रमांक 909/2020 और 913/2020 को खारिज कर दिया। वहीं जांच से जुड़े दस्तावेज मांगने वाली डब्ल्यूपीसी क्रमांक 912/2020 को मंजूर करते हुए राज्य सूचना आयोग का आदेश निरस्त कर दिया और मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए आयोग को वापस भेज दिया। याचिकाकर्ता ने सूरजपुर कलेक्टर कार्यालय के लोक सूचना अधिकारी से कपिल देव पैकरा और लवकेश कुमार पैकरा द्वारा विवाह पंजीयन के लिए प्रस्तुत आवेदन, संलग्न दस्तावेज, आदेश पत्र, विज्ञापन और रिपोर्ट की जानकारी मांगी थी। लोक सूचना अधिकारी ने जानकारी देने के बजाय संबंधित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रति उचित माध्यम से लेने की बात कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया था। प्रथम अपीलीय अधिकारी और राज्य सूचना आयोग ने भी याचिकाकर्ता को तीसरा व्यक्ति मानते हुए सूचना देने से इनकार कर दिया था। निजी जानकारी में नाम, पता और पहचान दस्तावेज भी शामिल हाई कोर्ट ने कहा कि विवाह पंजीयन आवेदन में नाम, उम्र, जन्मतिथि, पता, फोटो, पहचान संबंधी दस्तावेज, शपथपत्र सहित कई व्यक्तिगत जानकारियां होती हैं। ऐसी जानकारी निजी प्रकृति की है। केवल इसलिए कि यह रिकॉर्ड किसी सरकारी प्राधिकरण के पास है, उसे आरटीआई के तहत स्वतः सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता बड़े जनहित का कोई आधार भी नहीं बता सका। ऐसे में धारा 8(1)(जे) के तहत सूचना देने से इनकार उचित है। जांच के दस्तावेज वाले मामले में आयोग की चूक तीसरे मामले में याचिकाकर्ता ने डीपीएस तिवारी के खिलाफ शिकायत से संबंधित जांच के दस्तावेज, गवाहों के बयान और जांच रिपोर्ट मांगी थी। लोक सूचना अधिकारी ने जांच लंबित होने के आधार पर सूचना देने से इनकार किया था। प्रथम अपीलीय अधिकारी ने निर्धारित समय में निर्णय नहीं लिया। इसके बाद राज्य सूचना आयोग में दूसरी अपील की गई। आयोग ने प्रथम अपीलीय अधिकारी को भविष्य में सावधानी बरतने की चेतावनी दी, लेकिन सूचना देने से इनकार करने के मूल सवाल पर फैसला नहीं किया। 90 दिन में नए सिरे से फैसला करने का निर्देश हाई कोर्ट ने कहा कि राज्य सूचना आयोग केवल अधिकारियों की प्रक्रियागत चूक पर टिप्पणी करके दूसरी अपील का निपटारा नहीं कर सकता। वह अंतिम अपीलीय प्राधिकरण है और उसे यह तय करना होगा कि लोक सूचना अधिकारी द्वारा सूचना देने से इनकार करना कानूनन सही था या नहीं। कोर्ट ने आयोग का आदेश निरस्त करते हुए मामले को वापस भेज दिया है। आयोग को सभी संबंधित पक्षों को सुनने के बाद कानून के अनुसार कारणयुक्त आदेश पारित करने और प्रमाणित आदेश पेश किए जाने की तारीख से अधिमानतः 90 दिनों के भीतर दूसरी अपील का निराकरण करने कहा गया है।

राष्ट्रवाणी एक डिजिटल समाचार एवं जनचर्चा मंच है, जिसका उद्देश्य विश्वसनीय पत्रकारिता, सार्थक राष्ट्रीय विमर्श और जनहित से जुड़े मुद्दों को प्रभावशाली तरीके से समाज के सामने प्रस्तुत करना है।

हम मानते हैं कि पत्रकारिता केवल समाचार देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने, लोकतांत्रिक संवाद को मजबूत बनाने और राष्ट्र निर्माण की दिशा में सकारात्मक सोच विकसित करने का दायित्व भी है। “राष्ट्र प्रथम” की भावना के साथ राष्ट्रवाणी देश, समाज, शासन, अर्थव्यवस्था, कृषि, तकनीक, संस्कृति और जनसरोकारों से जुड़े विषयों को गहराई और तथ्यात्मक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करता है।

संपादक : नीरज दीवान

मोबाइल नंबर : 7024799009

© 2026 ThemeSphere. Designed by ThemeSphere.
Exit mobile version