भारतीय क्रिकेट टीम ने इंग्लैंड के खिलाफ चौथे टी20 अंतरराष्ट्रीय मैच में जो तमाशा खड़ा किया है, उसे देखकर हर सच्चे क्रिकेट प्रेमी का खून खौलना लाजिमी है। टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी का फैसला करने वाली भारतीय टीम महज़ 158 रनों पर ढेर हो गई। जोफ्रा आर्चर और जोश टंग जैसे गेंदबाजों के सामने भारतीय बल्लेबाज इस तरह कांपते दिखे जैसे कोई नौसिखिया पहली बार बल्ला थामे खड़ा हो। वैभव सूर्यवंशी जैसी तथाकथित युवा सनसनी लगातार शॉर्ट पिच गेंदों पर फंसकर पवेलियन लौट गई। पावरप्ले में सिर्फ 44 रन बनाना यह साफ दिखाता है कि इस टीम के पास आधुनिक टी20 क्रिकेट खेलने की न तो कोई रणनीति है और न ही हिम्मत। श्रेयस अय्यर की कप्तानी पूरी तरह से दिशाहीन और खोखली नजर आई, जिन्होंने मैच के बाद ‘सीरीज़ में अनुभव की कमी’ का रोना रोया।
159 रनों के मामूली लक्ष्य का पीछा करने उतरी इंग्लिश टीम को भारतीय गेंदबाजों ने मानो रेड कार्पेट बिछाकर जीत सौंप दी। अर्शदीप सिंह ने शुरुआती सफलता तो दिलाई, लेकिन उसके बाद फिल सॉल्ट और हैरी ब्रूक ने भारतीय गेंदबाजी की ऐसी धज्जियां उड़ाईं कि टीम इंडिया 9 विकेट की एक शर्मनाक और ऐतिहासिक हार के साथ सीरीज़ गंवा बैठी। यह पिछले 8 सालों में टी20 क्रिकेट के इतिहास में भारत की सबसे बड़ी और बेइज्जती से भरी शिकस्त है। टीम मैनेजमेंट इसे एक ‘बुरा दौर’ कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहा है, लेकिन सच यह है कि यह ‘सिस्टम की नाकामी’ है। करोड़ों रुपये के आईपीएल ब्रांड एंबेसडर बने इन खिलाड़ियों के पास जब देश के लिए खेलने का मौका आया, तो इनके पैर क्रीज पर जमने से पहले ही उखड़ गए। बीसीसीआई अब इस शर्मनाक टूर कोलैप्स की समीक्षा करने की बात कह रहा है, लेकिन जब पानी सिर से ऊपर जा चुका है, तो इस पोस्टमॉर्टम का क्या फायदा? भारतीय टीम का यह प्रदर्शन क्रिकेट नहीं, बल्कि देश के करोड़ों फैंस के भरोसे का कत्ल है।

