सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करने से किया इनकार
राष्ट्रवाणी, 07 अगस्त 2026। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को पाटन विधानसभा चुनाव से जुड़ी निर्वाचन याचिका मामले में सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली है। सर्वोच्च न्यायालय ने 7 अगस्त 2026 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें भाजपा नेता विजय बघेल द्वारा दायर निर्वाचन याचिका को प्रारंभिक स्तर पर खारिज करने से इनकार किया गया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भूपेश बघेल को हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अपने सभी कानूनी और तथ्यात्मक तर्क रखने की पूरी स्वतंत्रता रहेगी।
क्या है पूरा मामला
यह विवाद वर्ष 2023 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव से जुड़ा है। पाटन विधानसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी भूपेश बघेल ने भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल को लगभग 20 हजार मतों के अंतर से हराया था। चुनाव परिणाम में भूपेश बघेल को 95,438 वोट मिले थे, जबकि विजय बघेल को 75,715 मत प्राप्त हुए थे।
चुनाव के बाद भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल ने हाईकोर्ट में निर्वाचन याचिका दायर कर भूपेश बघेल के निर्वाचन को चुनौती दी। याचिका में आरोप लगाया गया कि 16 नवंबर 2023 को, मतदान से पहले लागू 48 घंटे की मौन अवधि (Silence Period) के दौरान भूपेश बघेल ने एक रैली या रोड शो किया, जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 का उल्लंघन है।
याचिका में मांग की गई कि भूपेश बघेल का निर्वाचन निरस्त किया जाए और उन्हें छह वर्षों के लिए चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जाए।
हाईकोर्ट ने क्या कहा था
भूपेश बघेल ने शुरुआत से ही निर्वाचन याचिका की पोषणीयता (Maintainability) पर सवाल उठाते हुए इसे प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज करने की मांग की थी।
उन्होंने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश-7 नियम-11 के तहत आवेदन प्रस्तुत किया था, जिसे छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 8 मई 2025 को खारिज कर दिया। इसके बाद भूपेश बघेल ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, लेकिन 22 जुलाई 2025 को अपनी याचिका वापस ले ली। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें हाईकोर्ट में पोषणीयता का मुद्दा उठाने की छूट दी।
इसके बाद हाईकोर्ट ने 14 अक्टूबर 2025 को इस संबंध में प्रारंभिक मुद्दा तय किया और 15 जून 2026 को फैसला सुनाते हुए कहा कि निर्वाचन याचिका सुनवाई योग्य है और इसे प्रारंभिक स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी गई
सुप्रीम कोर्ट में भूपेश बघेल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि निर्वाचन याचिका में लगाया गया आरोप केवल लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 126 से संबंधित है, जो एक निर्वाचन अपराध (Electoral Offence) है, न कि धारा 123(7) के तहत भ्रष्ट आचरण (Corrupt Practice)।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यदि आरोप सही भी मान लिया जाए, तब भी लगभग 20 हजार मतों के बड़े अंतर से मिली जीत को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि कथित घटना ने चुनाव परिणाम को भौतिक रूप से प्रभावित किया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों नहीं माना तर्क
भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह तय करना कि कथित कार्यक्रम वास्तव में हुआ था या नहीं, वह सार्वजनिक सभा थी या गुप्त बैठक, और क्या उससे चुनाव परिणाम प्रभावित हुआ, ये सभी तथ्यात्मक प्रश्न हैं।
न्यायालय ने कहा कि ऐसे प्रश्नों का निर्णय केवल दस्तावेजों के आधार पर प्रारंभिक स्तर पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए साक्ष्यों की जांच और पूर्ण सुनवाई आवश्यक है। इसलिए हाईकोर्ट द्वारा निर्वाचन याचिका को सुनवाई योग्य मानने के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सर्वोच्च न्यायालय ने भूपेश बघेल की याचिका खारिज करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश का अर्थ यह नहीं है कि भूपेश बघेल के सभी तर्क समाप्त हो गए हैं। उन्हें हाईकोर्ट में निर्वाचन याचिका की सुनवाई के दौरान सभी कानूनी और तथ्यात्मक बचाव प्रस्तुत करने का पूरा अधिकार रहेगा।
फैसले का कानूनी महत्व
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ है कि यदि किसी निर्वाचन याचिका में ऐसे तथ्यात्मक आरोप हैं, जिनकी सत्यता साक्ष्यों के आधार पर तय की जानी है, तो केवल प्रारंभिक आपत्ति के आधार पर याचिका को खारिज नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने संकेत दिया कि किसी कथित चुनावी उल्लंघन का चुनाव परिणाम पर वास्तविक प्रभाव पड़ा या नहीं, इसका निर्णय गवाहों, दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही किया जाएगा। इसलिए ऐसे मामलों में विस्तृत सुनवाई आवश्यक है।
अब यह मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में नियमित सुनवाई के लिए आगे बढ़ेगा, जहां दोनों पक्ष अपने-अपने साक्ष्य और कानूनी तर्क प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद ही यह तय होगा कि भूपेश बघेल के निर्वाचन को चुनौती देने वाली याचिका में लगाए गए आरोप सिद्ध होते हैं या नहीं और उनका चुनाव परिणाम पर कोई कानूनी प्रभाव पड़ता है या नहीं।

