राष्ट्रवाणी: प्रतिनिधि, बालोद। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के डौंडीलोहारा विकासखंड के अंतर्गत आने वाले ग्राम पंचायत खड़बत्तर के ठाकुरपारा के बाशिंदे आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करने को विवश हैं। एक तरफ जहां सरकार गांव-गांव और हर घर तक नल-जल योजना के माध्यम से शुद्ध पेयजल पहुंचाने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं धरातल की तस्वीर इन दावों की पोल खोलती नजर आती है।
इस छोटे से मोहल्ले के करीब 40 परिवार पिछले 15 लंबे वर्षों से पानी की एक-एक बूंद के लिए परेशानियों का सामना कर रहे हैं। आधुनिक विकास के इस दौर में भी इन परिवारों की सुबह खेतों की कीचड़ भरी पगडंडियों और लंबी दूर तय करने की जद्दोजहद के साथ शुरू होती है। ग्रामीणों के पास अपनी प्यास बुझाने के लिए गांव से काफी दूर निजी जमीन पर बने एक हैंडपंप पर निर्भर रहने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा है।
इस हैंडपंप तक पहुंचने के लिए महिलाओं और ग्रामीणों को चार अलग-अलग खेतों की मेड़ों और संकरी पगडंडियों को पार करना पड़ता है। खासकर बरसात के दिनों में यह रास्ता बेहद खतरनाक हो जाता है, जहां कीचड़ और भारी फिसलन के बीच महिलाओं को सिर पर पानी से भरी गुंडी या बाल्टी लेकर चलना पड़ता है। कई बार संतुलन बिगड़ने से महिलाएं गिरकर चोटिल हो जाती हैं।
इसके अलावा, खेतों के रास्तों पर जहरीले सांपों और कीड़े-मकोड़ों का खतरा हमेशा मंडराता रहता है, जिससे हर पल बड़ा हादसा होने का अंदेशा बना रहता है। स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि लगभग दो साल पहले उनके गांव में पानी की टंकी का निर्माण कराया गया था और घरों तक पाइपलाइन बिछाकर नल भी लगाए गए थे।
ग्रामीणों में उम्मीद जगी थी कि अब उन्हें इस नरकीय जीवन से मुक्ति मिल जाएगी, लेकिन विडंबना यह है कि उस टंकी से एक बूंद पानी भी घरों तक नहीं पहुंच पाया है। हैंडपंप के खराब होने पर पूरे पारे में त्राहि-त्राहि मच जाती है। इस संबंध में जब सरपंच बिरन बाई नेताम से बात की गई, तो उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि नया बोर कराने का प्रयास किया गया था, लेकिन उपयुक्त जगह निजी जमीन पर होने के कारण अनुमति नहीं मिल पाई।
बरसात का मौसम खत्म होने के बाद अन्य वैकल्पिक जगह पर बोर कराकर समस्या के समाधान का आश्वासन दिया गया है, लेकिन देखना यह होगा कि इन ग्रामीणों का यह संघर्ष कब समाप्त होता है।
