राष्ट्रवाणी: पश्चिम बंगाल में हुगली नदी के किनारे बसा बाटानगर, चेकोस्लोवाकिया के उद्योगपति थॉमस बाटा द्वारा स्थापित एक ऐतिहासिक औद्योगिक नगर है। बाटानगर की नींव चेकोस्लोवाकिया के उद्योगपति थॉमस बाटा ने रखी थी। बाटा शू कंपनी के कर्मचारियों के लिए औद्योगिक टाउनशिप डेवलप की।

यह शहर एशिया के सबसे बड़े जूता निर्माण केंद्रों में से एक बना। नई दिल्ली। भारत में ऐसे कई नगर और शहर हैं जो अपनी सालों पुरानी साख व सभ्यता के लिए जाने जाते हैं।

कोई शहर नदी पर बसा है तो किसी नगर को किसी नामी व्यक्ति ने बसाया। गंगा और नर्मदा समेत कई नदियों पर बसे कुछ शहर अपनी समृद्धता व संस्कृति के लिए मशहूर हैं तो कुछ नगर ऐसे भी हैं जिन्हें खास हस्तियों ने बसाया है। इनमें टाटा नगर, वालचंद नगर, मोदी नगर समेत कुछ खास नाम शामिल है, इसी कड़ी में बाटानगर (Batanagar) का नाम भी शामिल है, जिसे किसी भारतीय ने नहीं बल्कि एक विदेशी कारोबारी ने बसाया था।

आइये आपको बताते हैं आखिर कहां है बाटानगर, किसने इसे बसाया और कितना पुराना है इसका इतिहास? बाटानगर, पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में हुगली नदी के किनारे बसा है। यह शहर भारत के सबसे पुराने और प्रसिद्ध सुनियोजित औद्योगिक कस्बों में से एक है।

इस शहर की नींव चेकोस्लोवाकिया के प्रसिद्ध उद्योगपति थॉमस बाटा और उनकी कंपनी ‘बाटा शू कंपनी’ ने रखी। सन 1920 के दशक में भारत में विदेशी कंपनी बाटा ने जूते का कारोबार शुरू किया, और देश में बाटा के प्रोडक्ट को अच्छा रिस्पॉन्स मिलने लगा। ऐसे में जब भारत में जूतों की मांग बढ़ने लगी तो थॉमस बाटा ने भारत में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने का फैसला किया।

हालांकि, पहले कारखाना कोलकाता से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित कोननगर शहर में स्थापित किया गया था। लेकिन बाद में इसे स्थानांतरित किया गया। बाटा कंपनी ने प्लांट लगाने के लिए 1931 में कलकत्ता के पास हुगली नदी के तट पर ‘नूंगी’ नामक छोटे से गांव के पास जमीन खरीदी, और बाटानगर की नींव रखी।

3 साल के अंदर 1934 में इस जमीन पर बाटा की शू फैक्ट्री की शुरुआत हुई। खास बात है कि यहां कंपनी ने कर्मचारियों के रहने के लिए एक पूरी टाउनशिप बनाई। इसके बाद इस इलाके का नाम बाटा कंपनी और उसके फाउंडर, थॉमस के नाम पर ‘बाटानगर’ रखा गया।

बाटानगर में केवल जूतों की फैक्ट्री ही नहीं लगी बल्कि इसे सोशल और इंडस्ट्रियल टाउनशिप के रूप में डिज़ाइन किया। इस विदेशी कंपनी ने फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों से लेकर अधिकारियों तक के लिए पक्के मकान बनाए। बाटानगर में कर्मचारियों के परिवारों के लिए स्कूल, अस्पताल और मार्केट तक डेवलप किए गए।

इसके अलावा, फुटबॉल टूर्नामेंट, कल्चरल प्रोग्राम और सामुदायिक भोज के आयोजन के चलते इस शहर की खास पहचान बनी और इन रिवाजों ने इसे ‘बाटानगर संस्कृति’ को जन्म दिया। महज 15 सालों के अंदर ही बाटानगर एशिया के सबसे बड़े जूता निर्माण केंद्रों में से एक बन गया, और आज इसकी पहचान भारत के औद्योगिक नगर के तौर पर होती है।

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